जवाब ( 1 )

  1. मुख़्तसर (संक्षिप्त) जवाब:

    इस्लामी एकता का मतलब ये नहीं है कि सारे मज़हब एक हो जाएँ या शिया अहले सुन्नत बन जाएँ और अहले सुन्नत शिया हो जाएँ बल्कि एकता का मतलब यह है कि आपस में फ़र्क़ रखने के बावजूद आम मुसलमानों के दरमियान बहुत सी बातें कॉमन हैं, वह उन्ही कॉमन बातों पर एकता करके इस्लाम के दुश्मनों के ख़िलाफ़ एक यूनाइटेड मोर्चा खड़ा कर सकते हैं और आपस में एकता और सौहार्द बनाकर एक बड़ी ताक़त बन सकते हैं और इस तरह मुसलमानों पर बाहरी ताक़तों के प्रभाव और असर को रोक सकते हैं

    तफ़सीली (विस्तृत) जवाब:

    इस्लामी एकता

    उर्दू में वहदत लफ़्ज़ , “अल्लाह एक है” के अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है इसलिए यहाँ पर वहदत के बजाये सही शब्द इस्लामी इत्तेहाद है. इस्लामी इत्तेहाद का मतलब अलग अलग इस्लामी फ़िर्क़ों का एक हो जाना नहीं है, ऐसा इत्तेहाद अमल में लाया ही नहीं जा सकता और न ही इत्तेहाद के प्रचारकों ने कभी ऐसा कहा है. इत्तेहाद का मतलब इख़्तेलाफ़ात को नज़र अनदाज़ करके शिया का अहले सुन्नत बन जाना या इसका उल्टा भी नहीं है

    एकता के समान आधार

    शिया और अहले सुन्नत के बीच एकता का सही और वास्तविक मतलब यह है कि इन दोनों मज़हबों के बीच बहुत से कॉमन पॉइंट्स पाए जाते हैं और क़ुरान की नज़र में कॉमन बातों के आधार पर यहाँ तक कि ईसाईयों और यहूदियों के साथ भी इत्तेहाद हो सकता है और होना चाहिए. क़ुरान सिर्फ़ मुसलमानों के बीच इत्तेहाद की दावत नहीं देता बल्कि कॉमन पॉइंट्स के आधार पर दूसरे दीनों को भी इत्तेहाद की दावत दे रहा है, इत्तेहाद की एक एहम बुनियाद कॉमन बातें हैं और क़ुरान के लिहाज़ से जहाँ जहाँ जिसके साथ कॉमन पॉइंट्स पाए जाते हैं, उन्ही के आधार पर इत्तेहाद किया जा सकता है चाहे वह ईसाई और यहूदी ही क्यों न हो; इसलिए ख़ुदावन्दे आलम क़ुराने करीम की सामान्य शिक्षाओं में सारे अहले किताब को एकता की तरफ़ बुलाते हुए इरशाद फ़रमाता है:

    قُل يا أَهلَ الكِتابِ تَعالَوا إِلىٰ كَلِمَةٍ سَواءٍ بَينَنا وَبَينَكُم أَلّا نَعبُدَ إِلَّا اللَّهَ وَلا نُشرِكَ بِهِ شَيئًا وَلا يَتَّخِذَ بَعضُنا بَعضًا أَربابًا مِن دونِ اللَّهِ ۚ فَإِن تَوَلَّوا فَقولُوا اشهَدوا بِأَنّا مُسلِمونَ)سوره مبارکه آل عمران آیه ۶۴(

    इस आयत में बहुत से सार्वदेशिक सन्देश मौजूद हैं जिनमें से कुछ इस तरह हैं:

    क़ुरान के लिहाज़ से इत्तेहाद सिर्फ़ मुसलमानों से मख़सूस नहीं है बल्कि तमाम अहले किताब, ईसाई हों या यहूदी उन सबसे इत्तेहाद मुमकिन है, बल्कि ज़रूरी है क्योंकि यह क़ुरान का हुक्म है लिहाज़ा हम क़ुरान की तरफ़ से पूरी दुनिया के लिए दी जाने वाली तालीमात की बदौलत बिलकुल इत्मीनान के साथ सारे अहले किताब को इत्तेहाद की दावत देते हैं हालाँकि अगर वह, ख़ास कर यहूदी तंग नज़री से काम लें और इस दावत को ठुकरा दें فَإِن تَوَلَّوا तो उन्हें जताओ कि हम तो अभी भी अम्न पसंद हैं فَقولُوا اشهَدوا بِأَنّا مُسلِمونَ
    क़ुरान के हिसाब से इत्तेहाद तो अहले किताब के साथ है, मोमेनीन तो आपस में भाई हैं:
    إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ )سوره مبارکه حجرات آیه ۱۰(

    क़ुरान के लिहाज़ से इत्तेहाद की बुनियाद कॉमन पॉइंट है, चाहे वह एक ही क्यों न हो تَعالَوا إِلىٰ كَلِمَةٍ سَواءٍ بَينَنا وَبَينَكُم क्योंकि हम मुसलमानों में और ईसाईयों व यहूदियों में इख्तेलाफ़ के पॉइंट्स ज़्यादा हैं, और कॉमन पॉइंट्स में नाम की तौहीद के अलावा शायद ही कोई और चीज़ मिल सके
    क़ुरान की नज़र में इत्तेहाद की बुनियाद कॉमन पॉइंट है चाहे वह सिर्फ़ नाम ही के लिए क्यों न हो, क्योंकि इस आयत में अस्ल तौहीद को कॉमन पॉइंट के तौर पर पेश किया गया है जबकि अगर इस बात पर ग़ौर किया जाये तो पता चल जायेगा कि मुसलमानों के मुक़ाबिले में ईसाईयों और यहूदियों की तौहीद में काफी फ़र्क़ है, हक़ीक़त में तो तौहीद में भी कॉमन पॉइंट नहीं है क्योंकि उनके यहाँ तौहीद सिर्फ़ नाम की है, सही माना में वो लोग तौहीद के मानने वाले नहीं हैं, इस पॉइंट की रौशनी में क़ुरान हमें यह सार्वदेशिक सन्देश देना चाह रहा है कि भले ही वह कॉमन पॉइंट सिर्फ़ नाम ही के लिए क्यों न हो फिर भी उसी को इत्तेहाद की बुनियाद बनाया जा सकता है
    क़ुरान की रोशनी में इत्तेहाद के लिए आपस के कॉमन बिन्दुओं को हासिल करने में ढील (उदारता) से काम लो यानी कॉमन पॉइंट्स को ढूँढ कर तलाश करके बल्कि तराश तराश के, कुरेद कुरेद के निकालो, इत्तेहाद के लिए असली कॉमन पॉइंट्स नहीं बल्कि बहाने ढूँढो.
    इसी इत्तेहाद के लिए अल्लामा इक़बाल ने क्या ख़ूब कहा है:

    मंफ़’अत एक है इस क़ौम की, नुक़सान भी एक

    एक ही सबका नबी, दीन भी, ईमान भी एक

    हरमे पाक भी, अल्लाह भी, क़ुरान भी एक

    कुछ बड़ी बात थी, होते जो मुसलमान भी एक

    मुसलमानों के बीच कॉमन पॉइंट्स की लिस्ट बहुत लम्बी है, उनके बीच ख़ुदा, रसूल (स.), क़ुरान, काबा, अहलेबैत (अस.) की मुहब्बत, हज़रत अली (अ.), महदवियत का मसला…जैसे दीनी मसाएल के अलावा आज के बहुत से सियासी और समाजी मसाएल; जिनमें से फ़िलिस्तीन की अवाम का बचाव और इसराईल और अमरीका जैसे दुश्मनों से मुक़ाबला करना भी बयान किये जा सकते हैं इसलिए मुसलमानों के सारे फ़िर्क़ों को इन कॉमन पॉइंट्स के आधार पर एक दूसरे से नज़दीक आना चाहिए ताकि इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए आपस में मदद कर सकें क्योंकि दोनों का दुश्मन एक है. इस्लाम के दुश्मन, दोनों फ़िर्क़ों के दुश्मन हैं. इन दुश्मनों के मुक़ाबले में मोर्चा खोलना चाहिए ताकि दुश्मन उनके आपसी इख़तेलाफ़ात से ग़लत फ़ायदा न उठा सके बल्कि इन दोनों गिरोहों को अपने कॉमन पॉइंट्स की बुनियाद पर, इस्लाम दुश्मन ताक़तों के मुक़ाबले में मिल जुलकर अपना बचाव करना चाहिये

    शियों और सुन्नियों के बीच सदियों से वैचारिक मतभेद हैं, कभी कभी फ़ितना फैलाने वाले गुटों की जड़ें जमने से इन दोनों गिरोहों की एक दूसरे से दूरियां बढ़ी हैं, बल्कि तारीख़ में बहुत सी लड़ाईयाँ भी हुई हैं और बेशक इस युग में पश्चिमी देशों के सांस्कृतिक हमले के मुक़ाबले में मुसलमानों की एक कमज़ोरी, यही मसअला है.

    शिया और सुन्नी दोनों मुसलमान हैं और अक़ाएद, अहकाम और अख़लाक़ वगैरह में आपस में बहुत सी बातें उनके बीच कॉमन हैं हालाँकि आपस में कुछ बातों में मतभेद भी हैं जिनका इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन ये मतभेद दुश्मनी में बदल कर इस्लामी इत्तेहाद और भाईचारे पर गहरी चोट लगाने का सबब नहीं बनना चाहिए

    इत्तेहाद और सियासत

    वास्तव में एकता एक इस्लामी और क़ुरानी कॉन्सेप्ट और दीनी फ़रीज़ा है, इत्तेहाद सिर्फ़ सियासी नहीं है, फिर भी यही सियासत इत्तेहाद की बुनियाद भी बन सकती है.

    अल्लामा शरफ़ुद्दीन कहते हैं: सियासत, शिया और सुन्नियों के बीच अलगाव का सबब बनी है, यही शियों और अहले सुन्नत के बीच इत्तेहाद और एकता का सबब बनना चाहिए. {शरफ़ुद्दीन, अब्दुल हुसैन, इज्तेहाद दर मुक़ाबिले नस्स, दवानी, अली, पेज ८, किताबख़ान-ए-बुज़र्ग-ए-इस्लामी, १३९६ हिजरी}

    मतलब ये कि इस्तेमारी (कॉलोनियलिज़्म) सियासत और उपनिवेशियों की साज़िशों ने इस्लामी फ़िर्क़ों ,जिनमे शिया और अहले सुन्नत भी शामिल हैं. उनको एक दूसरे से अलग किया है, इसलिए यह इस्लामी सियासत का ही काम है कि कॉमन दुश्मन से मुक़ाबिला करने के लिए उन्हें एक करे.

    इत्तेहाद और इल्मी कोशिशें

    इत्तेहाद का यह मतलब भी नहीं है कि इन दो मज़हबों के बीच इल्मी बहेस को छोड़ देना चाहिए. इत्तेहाद और यकजहती की हिफ़ाज़त करते हुए भी इल्मी माहौल में इल्मी कोशिशों को जारी रखा जा सकता है, इस तरह कि दुश्मन उसका नाजाएज़ फ़ायदा न उठा सकें.

    वाज़ेह रहे कि इस इत्तेहाद को हासिल करने के लिए पहले एख़तेलाफ़ और जुदाई के असबाब और इत्तेहाद के रास्ते की रुकावटों का हटाना ज़रूरी है और दोनों ग्रुप को एक दूसरे के अक़ीदे और ख़यालात को सही मायनों में समझने का प्लेटफ़ॉर्म फ़राहम करना ज़रूरी है और ये चीज़ उलमा के बीच बात-चीत और इल्मी बहेस के बग़ैर मुमकिन नहीं हैं. इत्तेहाद, तहक़ीक़ और तलाश व कोशिश, हक़ीक़त की खोजबीन और इन्साफ़ मांगने, फ़िक्र की आज़ादी से न सिर्फ़ यह कि नहीं रोकता बल्कि उनके लिए मुनासिब माहौल तैयार करता है.

    अगर यह इल्मी बहसें, इल्मी तौर तरीक़ों के तहेत, सारे शिष्टाचार के उसूलों की पाबन्दी करते हुए अंजाम पायें तो न केवल दो मज़हबों के बीच एख़तेलाफ़ और अलगाव का सबब नहीं बनेंगी बल्कि एक दूसरे को पहचानने और नज़दीक लाने का सबब बनेंगी और परिणाम स्वरुप एकता और इत्तेहाद में और मज़बूती आयेगी. इस लिहाज़ से इल्मी बहसें न सिर्फ़ फूट डालने वाले नहीं हैं बल्कि इत्तेहाद को मज़बूत बनाने वाली भी हैं.

    तारीख़े इत्तेहाद

    तारीख़ का मुतालेआ करने से अलग-अलग मज़हबों के बीच इत्तेहाद और एकता के बहुत से नमूने और उनके नतीजे मिल सकते हैं और उनको इस्लामी समाजों में नमून-ए-अमल के तौर पर पेश किया जा सकता है

    हज़रत अली अ. की सीरत, इस्लामी भाईचारे और एकता के लिए बेहतरीन नमून-ए-अमल है. वह मुसलमानों के इत्तेहाद और यकजहती की हिफ़ाज़त के लिए न सिर्फ़ अपने हक़ को छोड़ देते थे बल्कि अपने विरोधियों की मदद करने से भी मना नहीं करते थे

    आलम-ए-इस्लाम के बहुत से बड़े उलमा और नामवर बुज्रुगों ने भी एकता और इत्तेहाद क़ाएम करने की कोशिश की है. हज़रत आयतुल्लाह बुरुजर्दी र., हज़रत इमाम ख़ुमैनी र., अल्लामा शरफ़ुद्दीन, सय्यद जमालुद्दीन असदाबादी, इमाम मूसा सद्र जैसे शिया उलमा तो उधर से अहले सुन्नत में से भी शेख़ शलतूत जैसों के नाम लिए जा सकते हैं; जिन्होंने मुसलमानों के फ़िर्क़ों के बीच एकता और इत्तेहाद क़ाएम करने के लिए प्रभावी और सराहनीय काम किये हैं

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