जवाब ( 1 )

  1. बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

    शैख़ सदूक़ अख़बारी नहीं थे, हाँ मुहद्दिस ज़रूर थे और इस फ़ील्ड के माहिर जानते हैं कि अख़बारी में और मुहद्दिस में बहुत फ़र्क़ है, लेकिन आम लोग चूंकि इस फ़र्क़ को नहीं समझ पाते इसलिए मामूली सी शबाहत को एक ही बताकर मुग़ालेता किया जा रहा है और यही सितम ज़रीफ़ी ख़ुद अख़बारियत के साथ भी हो रही है, आज जो लोग ख़ुद को अख़बारी कह रहे हैं वो असलियत में अख़बारी नहीं हैं और न ही अख़बारियत के मानी और मफ़हूम से वाक़िफ़ हैं. आज की अख़बारियत में और उस अख़बारियत में जो हौज़ा-ए-इल्मियह में एक ख़ास मकतबे फ़िक्र था, ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है.

    अख़बारियत हौज़ाते इल्मियह में उलमा के बीच एक ख़ास मकतबे फ़िक्र है, जिसकी बुनियाद मुल्ला मुहम्मद अमीन इस्त्राबादी (1036 हि.) ने “अल-फ़वाएदुल मदनियह” नामी किताब लिख कर डाली, इस किताब में उन्होंने इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त की, और इज्मा’अ और अक़्ल को इज्तेहाद के सोर्स के तौर पर रद्द करने के साथ साथ, क़ुरान के ज़ाहिरी मानी की हुज्जियत को भी रद्द कर दिया, और शरियत के सोर्सेज़ में सिर्फ़ अइम्म-ए- अतहार (अ.) की सुन्नत को ही क़ुबूल किया, यहाँ तक कि सुन्नते नबी (स.) को भी नहीं माना. इस लिहाज़ से अख़बारियत हौज़ा-ए-इल्मियह में एक नयी फ़िक्र थी, उससे पहले किसी ने ऐसी बात नहीं की थी, हालाँकि हमारे उलमा में बहुत से ऐसे थे जो लफ़्ज़े “इज्तेहाद” की मुख़ालेफ़त करते थे क्योंकि इज्तेहाद अहले सुन्नत के यहाँ राएज था जोकि क़यास पर बेस्ड होता था तो चूंकि इज्तेहाद का मतलब क़यास लिया जाता था इसलिए इज्तेहाद की मज़म्मत की जाती थी. शैख़ सदूक़ उसी दौर के हैं, जब इज्तेहाद क़यास के माना में था लिहाज़ा इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त उनके यहाँ पाई जाती है लेकिन ज़माना आगे बढ़ा, इज्तेहाद को दूसरे पहलुओं से देखा गया, इज्तेहाद को क़यास से पाक किया गया, यहाँ तक कि अल्लामा हिल्ली (र.) के दौर तक आते आते इज्तेहाद की लफ्ज़ क़यास से बिलकुल अलग हो गयी, अब इज्तेहाद बुरा न रहा, तब वाज़ेह हो गया कि उसूल

    की बुनियाद पर इज्तेहाद और है लेकिन क़यास दूसरी चीज़ है, तब पता चला कि बहुत से पिछले उलमा जिन्होंने इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त की है, वह अस्ल में इज्तेहाद की नहीं बल्कि क़यास की मुख़ालेफ़त है, वो लोग न सिर्फ़ अस्ले इज्तेहाद के मुख़ालिफ़ नहीं थे बल्कि ख़ुद भी उसूल पर बेस्ड इज्तेहाद ही किया करते थे, हालाँकि इज्तेहाद का नाम बदनाम होने की वजह से उसकी मुख़ालेफ़त भी किया करते थे, तो यह मस’अला अल्लामा हिल्ली (र.) के ज़माने में हल हो चुका था और हौज़ाते इल्मियह में उसूल पर आधारित इज्तेहाद अपने कमाल की मंजिलों को तय कर रहा था कि अचानक मुल्ला अमीन इस्त्राबादी ने एक बार फिर इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त की और अपने तरीक़े को शैख़ सदूक़ से निस्बत दी कि जिस तरह हमारे पुराने उलमा इज्तेहाद नहीं करते थे बल्कि उसकी मुख़ालेफ़त करते थे, मैं भी उन्हीं के तरीक़े पर चलते हुए इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त कर रहा हूँ जबकि मुल्ला अमीन जिस इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त कर रहे थे और पिछले उलमा जिस इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त कर रहे थे, दोनों में बड़ा फ़र्क़ था, पुराने उलमा क़यास पर बेस्ड इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त कर रहे थे न कि उसूल पर बेस्ड इज्तेहाद की, क्योंकि वो ख़ुद भी उसूल की बुनियाद पर इज्तेहाद किया करते थे यानी अमल में इज्तेहाद करते थे हालाँकि इज्तेहाद के नाम से परहेज़ करते थे, इस बुनियाद पर वह बहेस सिर्फ़ लफ्ज़ी थी जो हल हो चुकी थी मगर मुल्ला अमीन इस्त्राबादी उसूल पर बेस्ड इज्तेहाद की मुख़ालेफ़त कर रहे थे, इस लिहाज़ से दोनों के तरीक़ों में बहुत फ़र्क़ है.

    मुल्ला अमीन का अपना एक ख़ास तरीक़ा था जोकि इस बात से हटकर कि वह सही था या ग़लत लेकिन जो भी हो बहरहाल इल्मी था, और यह मकतबे फ़िक्र उलमा के बीच में था, इस मकतब की वजह से बहुत अच्छे आसार ज़ाहिर हुए हैं, अहादीस की तरफ़ पहले से ज़्यादा तवज्जोह दी गयी, कुतुबे अर्ब’अ से ज्यादा बड़ा काम तब हुआ जब हौज़ाते इल्मियह में अख़बारियत का ग़लबा था, बिहारुल अनवार, वसाएलुश-शिया और मुस्तदरक जैसी अज़ीम किताबें इसी दौर की हैं, यहाँ तक कि अख़बारियत की बुनियाद पर मकतबे इज्तेहाद में बहुत से निखार पैदा हुए, जिसकी वजह से इज्तेहाद अपने कमाल की उंची मंजिलों पर पहुँच गया

    ख़ुलासा यह कि हौज़ाते इल्मियह की अख़बारियत और है, इल्मी है, उलमा से मख़सूस है जबकि आज जो अख़बारियत राएज है वह सिर्फ़ जेहालत है, आज जब गली कूचों के अनपढ़, अंगूठा छाप लोग अख़बारी होने का, मौला की तक़लीद करने या इमामे मासूम की पैरवी करने का दावा करते हैं तो हंसी आ जाती है कि जिन्हें मौला का कलाम नहजुल बलाग़ा की एक लाईन सही से पढ़ना तक नहीं आता, वो छोटा मुंह कैसी बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं जबकि उनको पता भी नहीं कि वो क्या कह रहे हैं?!

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