जवाब ( 1 )

  1. बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

    नमाज़ के वाजिबात बल्कि रुक्न में से एक “तकबीरतुल एहराम” या “तकबीरे इफ़्तेताह” है उससे पहले 6 तकबीरें और भी मुस्तहब हैं जो कुल मिलकर 7 तकबीरें बनती हैं.

    (तहरीरुल वसीला, जि. 1, पे. 161)

    शरीयत का हिस्सा बनने की कैफ़ियत

    इन सात तकबीरों के शरीयत का हिस्सा बनने के बारे में रिवायात में यूँ मिलता है कि बचपन में काफ़ी दिनों तक इमामे हुसैन अ. की ज़बान पर बचपने के आसार मौजूद थे और आपकी ज़बान साफ़ नहीं हो पायी थी, लिहाज़ा एक बार रसूले ख़ुदा स. नमाज़ पढ़ रहे थे, आप के बग़ल में इमाम हुसैन अ. भी थे, रसूले ख़ुदा स. ने तकबीर कही, इमामे हुसैन अ.स. उसे सही से अदा नहीं कर सके, फिर रसूले ख़ुदा स. ने बार बार दुहराया और इमामे हुसैन अ. तकबीर को सही तरह से अदा करने की कोशिश करते रहे यहाँ तक कि रसूलुल्लाह स. ने सात बार तकबीर को दुहराया और इमामे हुसैन अ. ने सातवीं बार में साफ़ लहजे में तकबीर कही तब से सात तकबीरें सुन्नत बन गयीं. इस सिलसिले में इमामे सादिक अ. के अल्फ़ाज़ यह हैं:

    إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ(ص) کَانَ فِی الصَّلَاةِ إِلَى جَانِبِهِ الْحُسَیْنُ بْنُ عَلِیٍّ(ع) فَکَبَّرَ رَسُولُ اللَّهِ فَلَمْ یُحِرِ الْحُسَیْنُ(ع) التَّکْبِیرَ فَلَمْ یَزَلْ رَسُولُ اللَّهِ یُکَبِّرُ وَ یُعَالِجُ الْحُسَیْنُ التَّکْبِیرَ فَلَمْ یُحِرْهُ حَتَّى أَکْمَلَ سَبْعَ‏ تَکْبِیرَاتٍ فَأَحَارَ الْحُسَیْنُ التَّکْبِیرَ فِی السَّابِعَةِ فَقَالَ أَبُو عَبْدِ اللَّهِ وَ صَارَتْ سُنَّة

    (शैख़ सदूक़, मुहम्मद इब्ने अली, एललुश-शराए, जि. 2. पे. 332)

    शरीयत का हिस्सा बनाने की हिकमत

    عن هشام بن الحكم عن أبي الحسن موسى علیہ السلام قال: ان الله تبارك و تعالى خلق السماوات سبعا و الأرضين سبعا و الحجب سبعا، فلما أسرى بالنبي صلى الله عليه وآله و سلم وكان من ربه كقاب قوسين أو أدنى رفع له حجاب من حجبه فكبر رسول الله صلى الله عليه وآله و سلم و جعل يقول الكلمات التي تقال في الافتتاح فلما رفع له الثاني كبر فلم يزل كذلك حتى بلغ سبع حجب وكبر سبع تكبيرات۔

    (शैख़ सदूक़, मुहम्मद इब्ने अली, एललुश-शराए, जि. 2. पे. 332)

    इमामे मूसा काज़िम अ. से नक़्ल होने वाली ऊपर बयान की गयी हदीस के मुताबिक़ सात तकबीरों की हिकमत यह है कि अल्लाह ने सात ज़मीन व आसमान बनाये, इस लिहाज़ से अल्लाह से क़रीब होने के रास्ते में सात हिजाब (पर्दे) भी हैं, शबे मेराज जब पैग़म्बर स. बुलंदियों के सफ़र को तय कर रहे थे और वुजूद के पर्दे एक के बाद एक हटते चले जा रहे थे तो आप हर हिजाब के हटने पर तकबीर कहते, इस तरह आपने सात तकबीरें कहीं और क़ाबा क़ौसैन और अदना तक पहुँच गए, जहाँ जिबरईल जैसा फ़रिश्ता भी नहीं पहुँच सकता और चूँकि नमाज़ मोमिन की मेराज है लिहाज़ा नमाज़ में खड़ा अल्लाह की तरफ़ सफ़र करने वाला बंदा भी अपनी तकबीरों के ज़रिये इन हिजाबों को चाक करता (हटाता) हुआ अल्लाह की तरफ़ सैर व सुलूक करता है.

    नतीजा:

    सात तकबीर के सिलसिले में यह दोनों रिवायतें एक दूसरे से टकरा नहीं रही हैं बल्कि पहली हदीस सात तकबीरों की इस दुनिया की तस्वीर को पेश कर रही है तो दूसरी हदीस उसी की मलकूती (इस दुनिया की बातिनी हक़ीक़त का आलम) तस्वीर को बयान कर रही है और कमाल यह है कि दोनों तस्वीरें एक दूसरे से बिलकुल मैच करती हैं

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