जवाब ( 1 )

  1. 14 बेअसत मुबाबिक़ 622 ई 0 में हुक्मे रसूल (स.अ. ) के मुताबिक़ मुसलमान छुप छुप कर मदीने की तरफ़ जाने लगे और वहां पहुँच कर उन्होंने अच्छा मक़ाम हासिल कर लिया। क़ुरैश को जब मालूम हुआ कि मदीने में इस्लाम ज़ोर पकड़ रहा है तो (दारून नदवा) में जमा हो कर योजना बनाने लगे कि अब क्या करना चाहिये।
    किसी ने कहा मोहम्मद को यहीं क़त्ल कर दिया जाये ताकि उनका दीन ही ख़त्म हो जाये। किसी ने कहा जिला वतन कर दिया जाये। अबू जहल ने राय दी कि विभिन्न क़बीलों के लोग जमा हो कर एक साथ उन पर हमला कर के उन्हें क़त्ल कर दें ताकि क़ुरैश ख़ून बहा न ले सकें। इसी राय पर बात ठहर गई और सब ने मिल कर रसूले इस्लाम (स.अ. ) के मकान का घेराव कर लिया।
    परवरदिगार की हिदायत के अनुसार, आपने अपने बिस्तर पर हज़रत अली (अ.स.) के लिटा दिया और एक मुटठी धूल ले कर घर से बाहर निकले और काफिरों की आंखों में झोंकते हुए इस तरह निकल गये जैसे कुफ्र से ईमान निकल जाये।
    अल्लामा शिब्ली लिखते हैं कि यह सख़्त ख़तरे का मौक़ा था। जनाबे अमीर को मालूम हो चुका था कि क़ुरैश आपके क़त्ल का इरादा कर चुके हैं और आज रसूल अल्लाह (स.अ.) का बिस्तरे ख़्वाब क़त्लगाह की ज़मीन है लेकिन फ़ातेहे ख़ैबर के लिये क़त्लगाह फ़र्शे गुल था।(सीरतुन नबी व मोहसिने आज़म सन् 165 )
    सुबह होते होते दुश्मन दरवाज़ा तोड़ कर घर में घुसे तो अली को सोता हुआ पाया। पूछा मोहम्मद कहां हैं ? जवाब दिया जहां हैं ख़ुदा की अमान में हैं। तबरी में है कि अली (अ.स.) तलवार सूंत कर खड़े हो गये और सब घर से निकल भागे।

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