जवाब ( 1 )

  1. बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

    आपका सवाल इस्लामी शरीयत में मौजूद “मस’अल-ए-हेज़ानत” से मुताल्लिक़ भी है और “केफ़ालत” से भी. अलबत्ता आपके सवाल में मिलकियत की बात भी थी जोकि सरासर ग़लत है क्योंकि बच्चे कोई सामान या माल नहीं जो किसी की मिलकियत में हों, शायद यहाँ मिलकियत से आपका मतलब विलायत व सरपरस्ती हो जबकि मिलकियत और विलायत में बहुत फ़र्क़ है लिहाज़ा सवाल मिलकियत का नही बल्कि विलायत का हो सकता है इसलिए मिलकियत को किनारे रखकर यहाँ तीन अलग-अलग मस’अले हैं, हेज़ानत, केफ़ालत, और विलायत; इन तीनों के फ़र्क को समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि इनके आपसी फ़र्क को न समझने की वजह से ग़लत फ़ह्मियाँ पैदा हो सकती हैं.

    हेज़ानत: हेज़ानत यानी Custody का मतलब यह है कि बच्चे किसके पास रहेंगे? उनकी देख रेख कौन करेगा?

    केफ़ालत: यानी Financial Support इसका मतलब यह है कि बच्चों के ख़र्च का ज़िम्मेदार कौन होगा?

    विलायत: यानी Guardianship का मतलब यह है कि बच्चों का वाली और सरपरस्त कौन है? और इस विलायत का दाएरा बच्चों के माल व दौलत और उनकी शादी पर एख़्तियार और नज़ारत तक है.

    इस मामले में कोई दो राय नहीं है कि बच्चों की विलायत बाप और दादा के पास होती है और यह हर हाल में बाक़ी रहती है अलबत्ता इसमें कुछ अपवाद हैं जिनको तौज़ीहुल मसाएल में तफ़सील से बयान किया गया है. यहाँ पर उन्हें छेड़ने की ज़रूरत नहीं है.

    बच्चों की केफ़ालत भी आम तौर पर बाप ही के ज़िम्मे होती है चाहे बच्चे उसके पास हों यानी चाहे उसकी कस्टडी में हों या माँ की या किसी और की, केफ़ालत बहेरहाल बाप की ही ज़िम्मेदारी है और यह बहुत वाज़ेह सी बात है.

    लेकिन कस्टडी वाला मस’अला ज़रा टेढ़ा है ऐसा कि एक जुमले में नहीं कहा जा सकता कि ये ज़िम्मेदारी माँ को दी जाए या बाप को, क्योंकि इसमें बहुत सी बातें हैं उन सबको देखकर ही यह तय किया जा सकता है कि बच्चों की कस्टडी किसके हवाले की जाये, माँ को या बाप या अगर दोनों इस लाएक़ न हों तो किसी तीसरे रिश्तेदार को या नहीं बल्कि किसी ग़ैर को जो बच्चे को गोद लेना चाह रहा हो और अगर इनमें से कोई रास्ता न हो तो किसी समाजी संस्था के हवाले कर दिए जाएँ हालाँकि उनका ख़र्च बाप ही से लिया जायेगा क्योंकि वह उनकी केफ़ालत का ज़िम्मेदार है.

    इसीलिए माँ बाप को चाहिए कि एक दूसरे से अलग होने से पहले अपने बच्चों के फ़्यूचर के बारे में सोचें और इस बात पर ध्यान दें कि उनके इस फ़ैसले से उनके मासूम बच्चों पर क्या बुरा असर पड़ेगा और अक्सर समझदार मियाँ बीवी इसी बात की वजह से कभी कभी समझौता और सुल्ह कर लेते हैं. यह ज़िन्दगी का एक बड़ा फ़ैसला होता है जिसमे सिर्फ़ एक मर्द औरत ही नहीं बल्कि कुछ मासूम जानें बल्कि नस्लें दांव पर लगी होती हैं.

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