जवाब ( 1 )

  1. बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

    कुछ लोगों ने कहा है: रसूले ख़ुदा (स.) की आइशा के अलावा कोई ज़ौजा कुंवारी नहीं थीं और हज़रत ख़दीजा के बारे में कहा है:उन्होंने रसूले ख़ुदा स.से पहले दो मर्दों अतीक़ इब्न अब्दुल्लाह मख़ज़ूमी और अबू हाला तमीमी से शादी की थी और उनकी उन मर्दों से औलादें भी थीं.
    यह बात बुज़ुर्ग शिया उलमा की नज़र में सही व मानने योग्य नहीं है क्योंकि इस तरह की तमाम बातें अहलेबैत अ. के मुख़ालेफ़ीन ने हज़रत ख़दीजा (स.)के मक़ाम व मन्ज़ेलत को कम करने के लिए गढ़ी हैं और इसके अलावा हज़रत ज़हरा (स.)की वालेदए गिरामी होने के हवाले से भी १४०० साल से हज़रत ख़दीजा (स.)की शख़्सियत और ज़ात पर ऐसे हमले होते आ रहे हैं लिहाज़ा कुतुबे तारीख़ व हदीस में ग़ौर व फ़िक्र और इस बारे में इल्मी जवाबात से इस तरह के तमाम शुबहे (शंकाएं) खुद बखुद ख़त्म हो जाते हैं.
    अहले सुन्नत आलिम अबुल क़ासिम इस्माईल इब्न मुहम्मद इस्फ़हानी ने साफ़ तौर से बयान किया है कि हज़रत खदीजा (स.) बाकेरह (कुंवारी) थीं :
    وكانت خديجة امرأة باكرة ذات شرف ومال كثير وتجارة تبعث بها إلي الشام فتكون عيرها كعامة عير قريش
    हज़रत ख़दीजा (स.) बाकेरह,शरीफ़ और बहुत मालदार थीं और अपने तिजारती कारवाँ को शाम की तरफ़ रवाना किया करती थीं और उनका एक कारवाँ,क़ुरैश के सारे कारवानों (क़ाफ़िलों)के बराबर होता था.

    (अल -इसबहानी,अबुल क़ासिम इस्माईल बिन मुहम्मद बिन अल फ़ज़्ल अत-तैमी (वफ़ात 535 हि.) दलाएलुन-नबुव्वह, जि.1,पे.178, तहक़ीक़: मुहम्मद मुहम्मद अल-हद्दाद,प्रकाशक: दार तैबह,रियाज़)

    शिया आलिम अबुल क़ासिम कूफ़ी ने अपनी किताब “अल -इस्तेग़ासा” में बहुत ध्यान देने योग्य इल्मी दलील देते हुए लिखा है:
    أن الإجماع من الخاص والعام من أهل الأنال ونقلة الأخبار علي أنه لم يبق من أشراف قريش ومن ساداتهم وذوي النجدة منهم إلا من خطب خديجة ورام تزويجها فامتنعت علي جميعهم من ذلك فلما تزوجها رسول الله صلي الله عليه وآله وسلم غضب عليها نساء قريش وهجرنها وقلن لها خطبك أشراف قريش وأمراؤهم فلم تتزوجي أحدا منهم وتزوجت محمدا يتيم أبي طالب فقيرا لا مال له، فكيف يجوز في نظر أهل الفهم أن تكون خديجة يتزوجها أعرابي من تميم وتمتنع من سادات قريش وأشرافها علي ما وصفناه، ألا يعلم ذو التميز والنظر أنه من أبين المحال وأفظع المقال، ولما وجب هذا عند ذوي التحصيل ثبت أن خديجة لم تتزوج غير رسول الله (ص).
    शिया व सुन्नी इतिहासकारों और मुहद्देसीन का इत्तेफ़ाक़ है कि क़ुरैश में से कोई भी बुज़ुर्ग मालदार और सरदार ऐसा बाक़ी नहीं बचा था कि जिसने हज़रत ख़दीजा का रिश्ता न माँगा हो और उसकी इस मालदार बीबी से शादी करने की आरज़ू न हो लेकिन हज़रत ख़दीजा ने उन सबसे शादी करने से इंकार कर दिया और जब रसूले ख़ुदा स.ने उनसे शादी की तो क़ुरैश की तमाम औरतें हज़रत ख़दीजा से नाराज़ हो गयीं और उनके पास आना जाना तक छोड़ दिया और उन्होंने कहा: तुमने बुज़ुर्गाने क़ुरैश (क़ुरैश के बड़े बड़े लोगों)के रिश्तों को ठुकरा दिया है और ऐसे मर्द से शादी कर ली है कि जो फ़क़ीर है और मालदार नहीं है ?!
    इसके बावजूद अहले अक़्ल व शुऊर कैसे क़ुबूल कर सकते हैं कि हज़रत ख़दीजा ने क़बीलए बनी तमीम के एक बद्दू अरब से शादी कर ली थी और क़ुरैश के मालदारों के रिश्तों को ठुकरा दिया था ?!
    क्या साहेबाने अक़्ल व फ़हेम नहीं जानते कि ऐसी बात वाज़ेहतरीन मुहालात और ग़लततरीन बातों में से एक बात है. जब अहले तहक़ीक़ के लिए यह बात वाज़ेह हो जाती है तो साबित हो जाता है कि हज़रत ख़दीजा (स.)ने अपनी ज़िन्दगी में रसूले ख़ुदा (स.) के अलावा किसी दूसरे मर्द से शादी नहीं की थी .
    (अल-कूफ़ी,अबुल क़ासिम अली इब्ने अहमद इब्न मूसा इब्न इमाम अल-जवाद मुहम्मद बिन अली (वफ़ात 352 हि.) किताबे “अल-इस्तेग़ासा” ,जि .1,पे .70, मक्तबतु अहलुलबैत (अ .स .)सॉफ्टवेयर के मुताबिक़)
    अगर हज़रत ख़दीजा सरज़निश व मलामत (निंदा) के क़ाबिल थीं तो एक बद्दू अरब से शादी के बाद यह सरज़निश व मलामत क्यों नहीं की गयी थी?
    अलबत्ता कुछ लोगों ने ख़दीजा (स.) जैसी खूबसूरत और मालदार औरत का ख़ानदानी हसब व नसब होने के बावजूद शादी न करने को नामुमकिन कहा है और कहते हैं: क्या यह मुमकिन है कि ख़दीजा जैसी औरत के वालिद या वली उनको बग़ैर शादी के रहने दें और वह अकेली ज़िन्दगी गुज़ारती हों?

    तो इसका जवाब यह है कि पहली बात: हज़रत ख़दीजा के वालिद जंगे फ़ुज्जार में क़त्ल हो गए थे

    दूसरी बात:अगर हज़रत ख़दीजा के वालिद के अलावा कोई वली या सरपरस्त था तो वो उनको शादी करने पर मजबूर नहीं कर सकता था लिहाज़ा उन जैसी ख़ातून का एक मुनासिब और अपनी शान के मुताबिक़ शौहर के इन्तेज़ार में रहना, एक अक़्ली और क़ाबिले क़ुबूल काम माना जाता है.

    यहाँ पर एक सवाल और उठाया जाता है कि अगर हज़रत ख़दीजा का रसूले ख़ुदा स. से पहले कोई शौहर नहीं था तो ज़ैनब, रुक़य्या और उम्मे कुलसूम किसकी बेटियां थीं? क्या ये रसूले ख़ुदा स. की बेटियां थीं?

    इतिहासकारों के अनुसार हज़रत ख़दीजा की एक बहन थीं हाला, उन्होंने एक मख़ज़ूमी शख़्स से शादी की थी और उसकी एक बेटी थी कि जिसका नाम भी हाला था, फिर हाला ने एक तमीमी मर्द अबूहिंद से शादी की कि उस से भी एक बेटी थी जिसका नाम हिंद था.उस तमीमी मर्द की एक दूसरी भी बीवी थी और उससे उसकी दो बेटियां थीं कि जिनका नाम रुक़य्या और ज़ैनब था. उन दो बेटियों की माँ दुनिया से चली गयी और फिर उन्हीं दोनों का बाप भी दुनिया से चला गया. हाला की बेटी हिंद उसके शौहर के घर वालों को दे दी गयी और हाला अपनी दो बेटियों रुक़य्या और ज़ैनब के साथ हज़रत ख़दीजा के घर आ गयीं और बीबी ने उन दोनों की सरपरस्ती अपने ज़िम्मे ले ली और रसूले ख़ुदा स. से शादी के बाद ये दोनों रुक़य्या और ज़ैनब रसूले ख़ुदा स. और हज़रत ख़दीजा के पास थीं और उन्होंने उसी घर में तरबियत पाई और रसूले ख़ुदा स. की “रबीबा” कहलाने लगीं और अरब की रस्म व रिवाज के मुताबिक़ “रबीबा” को भी एक तरह की बेटी समझा जाता था और इसी वजह से उन दोनों को रसूले ख़ुदा स. और हज़रत ख़दीजा की बेटियाँ कहा जाता था.

    अस्ल में इस सवाल की बुनियाद यह प्रकल्पना है कि आयशा के अलावा रसूले ख़ुदा स. की कोई ज़ौजा कुंवारी नहीं थी जबकि अहले सुन्नत हज़रात की कुछ किताबों में यह बात दर्ज है कि वह भी पहले से शादी शुदा थीं जैसा कि इब्ने स’अद ने “अत-तबक़ातुल कुबरा” में लिखा है:

    عن عبد الله بن أبي ملكية قال خطب رسول الله صلي الله عليه وسلم عائشة بنت أبي بكر الصديق فقال إني كنت أعطيتها مطعما لابنه جبير فدعني حتي أسلها منهم فاستسلها منهم فطلقها فتزوجها رسول الله صلي الله عليه وسلم.

    अब्दुल्लाह इब्ने अबी मलीका कहता है: रसूले ख़ुदा स. ने जब आयशा बिन्ते अबूबक्र का रिश्ता माँगा तो अबूबक्रने कहा: मैंने आयशा का निकाह जुबैर इब्ने मुत’इम से कर दिया है, पहले मैं उससे बात कर लूँ, अबूबक्र ने उससे बात करके आयशा की पहले उससे तलाक़ ली और फिर रसूले ख़ुदा स. ने उनसे शादी की.

    (अज़-ज़ोहरी,मुहम्मद बिन मनी’अ अबूअब्दिल्लाह अल-बसरी,(वफ़ात 230 हि.),अत-तबक़ातुल-कुबरा,जि.8,पे.59, प्रकाशक: दारे सादिर, बैरूत)

    (अल-असक़लानी शाफ़ई, अहमद बिन अली बिन हजार अबुल फ़ज़ल (वफ़ात 852 हि.) अल-एसाबा फ़ी तमीज़िस सहाबा, जि.8,पे.17, शोध: अली मुहम्मद अल-बजावी, प्रकाशक” दारुल जबल, बैरूत)

    बहरहाल ख़ुदा बेहतर जानता है कि बीबी आयशा की शादी पहले से हो चुकी थी या नहीं लेकिन यह बात अपनीजगह तय है कि हज़रत ख़दीजा के लिए रसूले ख़ुदा स. के अलावा पहले से किसी दूसरे शौहर का साबित कर पाना तारीख़ की रौशनी में मुश्किल ही नहीं बल्कि तक़रीबन नामुमकिन है लिहाज़ा यह बात जाली और सरासर झूठ है या कम से कम तारीख़ी घटनाओं की अज्ञानता की वजह से इसकी ग़लत व्याख्या की गयी है.

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