जवाब ( 1 )

  1. बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

    अरबी ज़बान में “आल” और “अह्ल” का इस्तेमाल इन्सान के ख़ास और क़रीबी रिश्तेदारों के लिए होता है, जोकि बच्चों और क़रीबी रिश्तेदारों को भी शामिल होगा. लेकिन आयात व रिवायात में लफ़ज़े “अह्ल” की एक ख़ास परिभाषा है:

    क़ुराने करीम में हम देखते हैं कि लफ़ज़े “अह्ल” अंबिया के ख़ानदान में से कुछ ख़ास लोगों के लिए इस्तेमाल हुआ है और सब रिश्तेदार मुराद नहीं हैं. इसलिए कि क़ुरान में जनाबे नूह अ. के बेटे को उनके “अह्ल” से बाहर किया गया है.

    قَالَ يَانُوحُ إِنَّهُ لَيْسَ مِنْ أَهْلِكَ إِنَّهُ عَمَلٌ غَيرصَالِح (सूरह हूद, आयत 46)

    अल्लाह ने फ़रमाया: ऐ नूह! वो आपके “अह्ल” में से नहीं,वह एक ग़ैर सालेह अमल है.

    सूरए अहज़ाब की आयत न. 33 की शाने नुज़ूल के सिलसिले में अहले सुन्नत हदीसे किसा की रिवायत को बयान करते हैं:

    عن صَفِيَّةَ بِنْتِ شَيْبَةَ، قَالَتْ قَالَتْ عَائِشَةُ خَرَجَ النَّبِيُّ صلي الله عليه وسلم غَدَاةً وَعَلَيْهِ مِرْطٌ مُرَحَّلٌ مِنْ شَعْرٍ أَسْوَدَ فَجَاءَ الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ فَأَدْخَلَهُ ثُمَّ جَاءَ الْحُسَيْنُ فَدَخَلَ مَعَهُ ثُمَّ جَاءَتْ فَاطِمَةُ فَأَدْخَلَهَا ثُمَّ جَاءَ عَلِيٌّ فَأَدْخَلَهُ ثُمَّ قَالَ (إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا).

    (सहीह मुस्लिम,जि.7, पे.130,हदीस न.6414)

    हज़रत आयशा कहती हैं कि रसूले ख़ुदा स. सुबह के वक़्त बाहर गए और उनके कांधों पर काले बालों के नक़्श व निगार वाली अबा थी. फिर हसन इब्न अली अ. आये उनको आपने अबा में लिया. फिर हुसैन अ. आये उनको भी अबा में दाख़िल किया. फिर फ़ातिमा स. आयीं उनको भी अबा में लिया. फिर अली अ. आये उनको भी अबा में दाख़िल किया. फिर फ़रमाया: ख़ुदावंदे मुत’आल चाहता है कि आप अहलेबैत अ. से नजासत को दूर रखे और आपको पाक रखे जैसा कि पाक रखने का हक़ है.

    ودعا رسول الله صلي الله عليه وسلم الحسن والحسين وعليا وفاطمة فمد عليهم ثوبا فقال اللهم هؤلاء أهل بيتي فأذهب عنهم الرجس وطهرهم تطهيرا

    (सुननुन-निसाई अल-कुबरा,जि. 5, पे.113)

    रसूले ख़ुदा स. ने हसन अ. व हुसैन अ. और अली अ. व फ़ातिमा स. को बुलाया फिर एक कपड़ा आप पर डाला और कहा परवरदिगारा! यह मेरे अहलेबैत अ. हैं लिहाज़ा उनसे रिज्स (हर तरह की नजासत और बुराई) को दूर रख और उनको पाक व पाकीज़ा रख जैसा कि पाक रखने का हक़ है.

    حدثنا محمود بن غيلان حدثنا أبو أحمد الزبيري حدثنا سفيان عن زبيد عن شهر بن حوشب عن أم سلمة أن النبي صلي الله عليه وسلم جلل علي الحسن والحسين وعلي وفاطمة كساء ثم قال اللهم هؤلاء أهل بيتي وخاصتي أذهب عنهم الرجس وطهرهم تطهيرا فقالت أم سلمة وأنا معهم يا رسول الله قال إنك إلي خير قال هذا حديث حسن وهو أحسن شيء روي في هذا وفي الباب عن عمر بن أبي سلمة وأنس بن مالك وأبي الحمراء ومعقل بن يسار وعائشة

    (सुननुत-तिरमिज़ी,जि. 5, पे. 699)

    रसूले ख़ुदा स, की ज़ौजा जनाबे उम्मे सलमा फ़रमाती हैं: रसूले ख़ुदा स. ने हसन अ. व हुसैन अ., अली अ. और फ़ातिमा स. पर अबा डाली. फिर फ़रमाया: ख़ुदाया! यह मेरे अहलेबैत अ. और मेरे ख़ास हैं, इनसे रिज्स (हर तरह की नजासत और बुराई) को दूर रख और इन्हें पाक व पाकीज़ा रख जैसा कि पाक रखने का हक़ है.

    उम्मे सलमा कहती हैं कि मैंने रसूले ख़ुदा स. से पूछा कि क्या मैं भी इनके साथ हूँ (अहलेबैत अ. में से)? तो आपने फ़रमाया: तुम ख़ैर पर हो (अहलेबैत अ. में से नहीं हो लेकिन नेकी पर हो)

    तिरमिज़ी कहते हैं कि यह हदीस हसन है और इस सिलसिले में बेहतरीन रिवायत है…

    अलबानी अपनी किताब (सहीह सुननुत-तिरमिज़ी,अलबानी,जि.3 पे.306 हदीस,3205) में इस हदीस को सहीह जानते हैं.

    इसके अलावा हाकिमे नैशापूरी इस हदीस को बयान करते हुए कहते हैं:

    هذا حديث صحيح علي شرط البخاري ولم يخرجاه.

    (अल-मुस्तदरक, जि. 2, पे. 416 , जि.3, पे. 146)

    यह हदीस सहीह बुख़ारी की शर्त के लिहाज़ से सहीह है लेकिन उन्होंने इसे ज़िक्र नहीं किया है.

    इसी तरह इसी मज़मून की एक और रिवायत को ज़िक्र करने के बाद कहते हैं:

    هذا حديث صحيح علي شرط مسلم ولم يخرجاه.

    (अल-मुस्तदरक, जि. 2, पे. 416)

    यह हदीस सहीह मुस्लिम की शर्त के लिहाज़ से सहीह है लेकिन उन्होंने इसे ज़िक्र नहीं किया है.

    यहाँ तक कि तबरानी, जि.3,पे.52 हदीस न. 2662 से 2673 तक दस हदीसें लेकर आते हैं कि जिनमें इसी मफ़हूम को वाज़ेह तौर पर बयान किया गया है कि अहलेबैते रसूले ख़ुदा स. सिर्फ़ अली अ., फ़ातिमा स., हसन अ. और हुसैन अ. हैं और यहाँ तक कि उम्मे सलमा जो रसूले ख़ुदा स. की ज़ौजा हैं उनका शुमार उनमें नहीं है.

    मज़े की बात यह है कि वहाबियों के नज़रियाती आक़ा इब्ने तैमियह ने इस बारे में कहा है:

    والحسن والحسين من أعظم أهل بيته اختصاصا به كما ثبت في الصحيح أنه دار كساءه علي علي وفاطمة وحسن وحسين ثم قال اللهم هؤلاء أهل بيتي فأذهب عنهم الرجس وطهرهم تطهيرا

    (मिन्हाजुस-सुन्नतुन-नबविया, जि.4,पे.561)

    सहीहुस-सनद अहादीस से साबित है कि रसूलुल्लाह स. ने अहलेबैत अ. के अफ़राद को अली अ. व फ़ातिमा स. व हसन अ. और हुसैन अ. पर चादर डालकर मख़सूस किया और फ़रमाया: ख़ुदाया! यही हैं कि जो मेरे ख़ानदान से हैं लिहाज़ा इनसे रिज्स को दूर रख और इन्हें पाक क़रार दे.

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