जवाब ( 1 )

  1. बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

    हदीसे किसा के सहीह होने में किसी तरह के शक व शुबहे की कोई गुंजाईश नहीं क्योंकि शिया और अहले सुन्नत उलमा के बीच यह हदीस मुतवातिर है.

    शिया हवालों के लिए देखें:

    1. अल्लामा हिल्ली, हसन इब्ने यूसुफ़, नहजुल हक़ व कश्फुस-सिद्क़, पे. 228 व 229, दारुल किताबिल लिबनानी, बैरूत, पहला संस्करण, 1982

    2. बहरानी, इस्फ़हानी, अब्दुल्लाह बिन नूरुल्लाह, अवालिमुल उलूम वल म’आरिफ़ वल अहवाल मिनल आयाते वल अख़बारे वल अक़वाल (मुस्तदरक सय्येदतुन-निसाई इलल इमामिल जवाद), शोधक व संशोधक: मुवह्हिद अबतही इस्फ़हानी, मुहम्मद बाक़िर, जि. 11, दूसरा हिस्सा, फ़ातिमा (स.), पे. 930-934, मोअस्ससतुल इमामिल महदी (अ.ज.), क़ुम,पहला संस्करण, 1413 हि.

    3. मुज़फ़्फ़र नजफ़ी, मुहम्मद हसन, दलाएलुस-सिद्क़ लेनहजिल हक़, जि. 6,पे.251,मोअस्सतु आलिल बैत (अ.),क़ुम, पहला संस्करण, 1422 हि.

    4. इब्ने ताऊस,अली इब्ने मूसा, अत-तराएफ़ फ़ी मारेफ़ते मज़ाहिबित-तवाइफ़, शोधक व संशोधक: आशूर,अली, जि.1,पे.113,प्रकाशक:ख़य्याम,पहला संस्करण,1400 हि.

    5. मजलिसी,मुहम्मद बाक़िर,बिहारुल अनवार, जि.25,पे.237-240, दारु एहयाइत तुरासिल अरबी, बैरूत, दूसरा संस्करण,1403 हि.

    अहले सुन्नत हवालों के लिए देखें:

    1.अहमद बिन हंबल, मुसनद, बाबे बिदायह

    2. मुसनदे अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास व बाबे हदीसे वासेला इब्नुल अस्क़’अ

    3. सुनने तिरमिज़ी, बाबे “मिन सूरतिल अहज़ाब”

    4. आलूसी, सय्यद महमूद, रूहुल म’आनी फ़ी तफ़सीरिल क़ुरानिल अज़ीम, शोध: अब्दुल बारी, अतिय्या, अली, जि.11,पे. 195,दारुल कुतुबिल इल्मिया,बैरूत,पहला संस्करण,1415 हि.

    5. हसकानी,हाकिम,शवाहिदुत-तंज़ील लेक़वाएदित-तफ़ज़ील,जि.2,पे.17,प्रकाशन मोअस्सस-ए-तब’अ व नश्र,तेहरान,1411 हि.

    आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी किताब मफ़ातीहे नवीन में हदीसे किसा के बारे में फ़रमाते हैं कि इस हदीस का मज़मून कि पंजतने आले एबा एक चादर के नीचे इकठ्ठा हुए और ऐसे में उनकी शान में आयते ततहीर إِنَّما یُریدُ اللَّهُ لِیُذْهِبَ عَنْکُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَیْتِ وَ یُطَهِّرَکُمْ تَطْهیراً का नुज़ूल हुआ, शिया और अहले सुन्नत के बुज़ुर्ग उलमा के नज़दीक बहुत मशहूर व मारूफ़ है.

    (मफ़ातीहे नवीन, आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी,पांचवां संस्करण,पे.1165)

    किताबे “फ़ातिमतुज़-ज़हरा बह्जतो क़ल्बिल मुस्तफ़ा” हदीसे किसा के मुकम्मल सिलसिल-ए-सनद को बयान करते हुए शैख़ कुलैनी के बाद भी सय्यद हशिमे बहरानी तक और शैख़ कुलैनी से पहले भी सहाबिये रसूल स. जनाबे जाबिर इब्ने अब्दुल्लाहे अंसारी और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स. तक यूँ बयान फ़रमाते हैं:

    सय्यद हाशिमे बहरानी ने सय्यद माजिदे बहरानी से, उन्होंने हसन बिन ज़ैनुद्दीन शहीदे सानी से उन्होंने मुक़द्दस अर्दबेली से, उन्होंने अली इब्ने अब्दुल आली कर्की से, उन्होंने अली इब्ने हिलाल जज़ायरी से, उन्होंने अहमद इब्ने फ़हेद हिल्ली से, उन्होंने अली इब्ने ख़ाज़िने हायरी से, उन्होंने अली इब्ने मुहम्मद मक्की शहीदे अव्वल से, उन्होंने अपने वालिद शहीदे अव्वल से, उन्होंने फ़ख़रुल मोहक़्क़ेक़ीन अल्लामा हिल्ली के बेटे से, उन्होंने अपने वालिद अल्लामा हिल्ली से, उन्होंने मोहक़्क़िक़े हिल्ली से, उन्होंने इब्ने नमा हिल्ली से, उन्होंने इब्ने इदरीस हिल्ली से, उन्होंने इब्ने हम्ज़ा तूसी साहेबे किताबे साक़िबुल मनाक़िब से, उन्होंने इब्ने शहरे आशोब से, उन्होंने तबरसी साहेबे किताबे एहतेजाज से, उन्होंने हसन इब्ने मुहम्मद शैख़ तूसी के बेटे से, उन्होंने अपने वालिद शैख़ तूसी से, उन्होंने शैख़ मुफ़ीद से, उन्होंने इब्ने क़ौल्वैह क़ुम्मी से, उन्होंने शैख़ कुलैनी से, उन्होंने अली इब्ने इब्राहीम से, उन्होंने अपने वालिद इब्राहीम बिन हाशिम से, उन्होंने अहमद इब्ने मुहम्मद इब्ने अबी नसरे बज़नती से, उन्होंने क़ासिम इब्ने यहया जला कूफ़ी से, उन्होंने अबू बसीर से, उन्होंने अबान बिन तग़लिब से, उन्होंने जाबिर इब्ने यज़ीदे जोफ़ी से, उन्होंने जाबिर इब्ने अब्दुल्लाहे अंसारी से, उन्होंने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स. से.

    (फ़ातिमा ज़हरा बहजतो क़ल्बिल मुस्तफ़ा, पे.292-293, मुल्हक़ाते एह्क़ाक़ुल हक़ से नक़्ल करते हुए, जि.2,पे.554 और उस किताब में अवालिमुल उलूम,अल्लामा शैख़ अब्दुल्लाह बहरानी,जि.11,पे.638-642 से नक़्ल करते हुए)

    इस सनद पर कोई इश्काल नहीं हो सकता है हालाँकि फिर भी ऐतेराज़ करने वालों ने यूँ एतेराज़ किया है कि क़ासिम इब्ने यहया जला कूफ़ी रेजाली किताबों में मजहूल हैं या यह एतेराज़ किया है कि यह हदीस ख़बरे वाहिद है यानी जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी के अलावा किसी और सहाबी ने इसे नक़्ल नहीं किया है इसलिए यह ख़बरे वाहिद है तो इसका जवाब यह है कि क़ासिम इब्ने यहया के मजहूल होने से भी हदीस में कोई कमज़ोरी नहीं आती क्योंकि इससे पहले और ख़ासकर इसके बाद के सिलसिले इतने मज़बूत हैं कि इससे हदीस के सहीह होने पर कोई असर नहीं पड़ता और फ़न्नी तौर से ख़बरे वाहिद होना भी ख़बर के ज़ईफ़, ग़ैर सहीह या जाली होने की दलील नहीं, ख़बरे वाहिद के सिलसिले में क़ुरान की आयतيَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن جَاءَكُمْ فَاسِقٌ بِنَبَإٍ فَتَبَيَّنُوا أَن تُصِيبُوا قَوْمًا بِجَهَالَةٍ فَتُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا فَعَلْتُمْ نَادِمِينَحجرات/۶ के लिहाज़ से यह देखा जाता है कि वह वाहिद कौन है, इस हदीस में वह वाहिद रसूल स. के सच्चे अज़ीमुश-शान सहाबी जनाबे जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी हैं, जिनके बारे में झूट गढ़ने का गुमान भी नहीं किया जा सकता. अल्लामा सय्यद मुर्तज़ा असकरी इस सिलसिले में फ़रमाते हैं कि यह वह ख़बरे वाहिद है कि सनद और मत्न के लिहाज़ से दूसरी कोई हदीस इसकी बराबरी नहीं कर सकती.

    (हदीसुल किसा फ़ी कुतुबे मदरसतिल ख़ोलफा व मदरसते अहलिल बैत अलैहिमुस-सलाम,दूसरा हिस्सा, पे.15)

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