काबे के चारों तरफ़ बने दो मंज़िला पुल पर क्या तवाफ़ करना जाएज़ है?

एख़्तियार या मजबूरी की हालत में क्या पुल के ऊपर से तवाफ़ करना सही है? और उस सूरत में नमाज़-ए- तवाफ़ का क्या हुक्म होगा?

जवाब 

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

मुख़्तसर (संक्षिप्त) जवाब

इस सिलसिले में सारे मराजे का फ़तवा यह है कि अगर पुल की ऊँचाई ख़ान-ए-काबा की छत से ज़्यादा नहीं है तो तवाफ़ सहीह है और अगर ज़्यादा है तो सही नहीं हैं, दूसरी बात ये कि तवाफ़ और नमाज़-ए-तवाफ़ जो मक़ाम-ए-इब्राहीम के सामने पढी जाती है इन दो चीज़ों के बीच में फ़ासला नहीं होना चाहिए लिहाज़ा अगर हाजी के लिए तवाफ़ और उसकी नमाज़ को एक के फ़ौरन बाद दूसरे अमल का अंजाम देना मुमकिन न हो तो (क्योंकि तवाफ़ के बाद नमाज़-ए-तवाफ़ के लिए दूसरी मंज़िल से मस्जिद के सहेन तक आने में काफ़ी गैप आ जायेगा जो कि दस मिनट के मामूली गैप की तरह नहीं होगा बल्कि उससे ज़्यादा हो सकता है) ऐसी सूरत में पुल के ऊपर से किया हुआ तवाफ़ काफ़ी नहीं होगा 

तफ़सीली (विस्तृत) जवाब

जहाँ तक पहली मंज़िल का सवाल है तो उस पर हालते एख़्तियार में भी तवाफ़ किया जा सकता है हालाँकि एहतियाते वाजिब यह है कि वाजिब तवाफ़ और उसकी नमाज़ के बीच मुवालात (कामों को इस तरह एक के बाद एक अंजाम देना कि देखने वाले को ज़्यादा फ़ासला महसूस न हो) का ख़याल रखा जाये. लिहाज़ा अगर पुल के ऊपर ही मक़ामे इब्राहीम के पीछे नज़दीक ही नमाज़ पढ़ना मुमकिन हो जिससे नमाज़ में ज़्यादा फ़ासला न आये तो कोई हर्ज नहीं. और दूसरी मंज़िल के बारे में अगर इन्सान को यक़ीन हो कि वह दीवारे काबा से कम ऊंचाई पर है चाहे एक बालिश्त ही सही तो उस पर भी एख्तियर की हालत में तवाफ़ जाएज़ होगा सेवाए यह कि मुकल्लफ़ (जिस पर शरई जिम्मेदारियां अदा करना वाजिब हो) के लिए यह मुमकिन न हो कि वह वाजिब तवाफ़ और उसकी नमाज़ के बीच मुवालात (एक के बाद एक अमल) को बाक़ी रख सके क्योंकि तवाफ़ के बाद नमाज़े तवाफ़ के लिए दूसरी मंज़िल से मस्जिद के सहेन तक आने में काफ़ी फ़ासला आ जायेगा जोकि दस मिनट के मामूली गैप की तरह नहीं होगा लिहाज़ा उस सूरत में पुल के ऊपर से किया हुआ तवाफ़ काफ़ी नहीं होगा

यह हुक्म एख्तियार की हालत में है और वह शख्स जिसको पुल की ऊपर वाली मंज़िल पर ही तवाफ़ करने पर मजबूर कि जाये (जैसे वो मरीज़ जोकि व्हील चेयर पर होते हैं) तो उनके लिए ऐसा तवाफ़ जाएज़ होगा और हालते मजबूरी में तवाफ़ और उसकी नमाज़ में फ़ासला भी कोई हर्ज नहीं रखता

लेकिन अगर मुकल्लफ़ को, पुल की ऊपर वाली मंज़िल के दीवारे काबा से ऊँचे होने (चाहे एक बालिश्त ही सही) का यक़ीन न हो तो फिर उस पर तवाफ़ करना काफ़ी नहीं होगा लिहाज़ा अगर वह उन लोगों में से हो कि जिन्हें व्हील चेयर वालों की तरह ऊपर वाली मंज़िल से ही तवाफ़ करने पर मजबूर किया जाये तो उसे चाहिए कि ऊपर वाली मंज़िल से तवाफ़ के साथ किसी दूसरे शख्स को मस्जिद के सहन या पहली मंज़िल से तवाफ़ करने के लिए नाएब भी बनाये.

इस्तेफ़्ताआत आयतुल्लाह सीस्तानी "सवाल और जवाब" हज-तवाफ़


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