ईदे ग़दीर की फ़ज़ीलत और उसके आमाल क्या हैं?

ईदे ग़दीर की फ़ज़ीलत और उसके आमाल क्या हैं? 

जवाब 

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

अठ्ठारह ज़िलहिज्ज का दिन 

यह ईदे ग़दीर का दिन है जो ख़ुदावंदे आलम और आले मुहम्मद (स.) की सबसे बड़ी ईदों में से है. हर पैग़म्बर (अ.) ने इस दिन ईद मनाई है और हर नबी ने इस दिन की शान व अज़मत को क़ुबूल किया है. आसमान में इस ईद का नाम “रोज़े अह्दे माहूद” है और ज़मीन में इसका नाम “मीसाक़े माखूज़ व जम’ए मशहूद” है. एक रिवायत के मुताबिक़ इमाम जाफ़र सादिक़ अ. से पूछा गया की जुम’आ, ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुरबान के अलावा भी मुसलमानों की कोई ईद है? हज़रत ने फ़रमाया: हाँ इसके अलावा भी एक ईद है और वह बड़ी इज़्ज़त व शरफ़ की हामिल है. अर्ज़ किया गया कि वह कौन सी ईद है? आपने फ़रमाया कि वह दिन कि जिसमें हज़रत रसूले आज़म स. ने अमीरुल मोमेनीन अ. का त’आरुफ़ अपने ख़लीफ़ा के तौर पर कराया, आप स. ने फ़रमाया कि जिसका मैं मौला हूँ, अली अ. भी उसके मौला हैं और यह अठ्ठारवीं ज़िलहिज्ज का दिन और रोज़े ईदे ग़दीर है, रावी ने अर्ज़ की कि उस दिन हम क्या अमल करें? हज़रत ने फरमाया: कि उस दिन रोज़ा रखो, ख़ुदा की इबादत करो, मुहम्मद स. व आले मुहम्मद स. का ज़िक्र करो और उन पर सलवात भेजो.

हुज़ूर स. ने अमीरुल मोमेनीन अ. को इस दिन ईद मनाने की वसिय्यत फ़रमाई जैसे हर पैग़म्बर अपने वसी को इसी तरह वसिय्यत करता रहा है:

इब्ने अबी नस्रे बज़न्ती ने इमाम अली रज़ा अ. से रिवायत की है कि हज़रत ने फ़रमाया: तुम जहाँ कहीं भी रहो रोज़े ग़दीर नजफ़े अशरफ़ पहुँचो और हज़रत अमीरुल मोमेनीन अ. की ज़ियारत करो कि हर मोमिन मर्द और हर मोमिना औरत और हर मुसलमान मर्द व औरत के साठ साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं और यह कि पूरे माहे रमज़ान शबे क़द्र और शबे ईदे फ़ित्र में जितने इन्सान जहन्नम की आग से आज़ाद किये जाते हैं, इस एक दिन में उससे दोगुने अफ़राद को जहन्नम से आज़ाद किया जाता है. इस दिन अपने ज़रूरतमंद मोमिन भाई को एक दिरहम सदक़े के तौर पर देना दूसरे दिनों में एक हज़ार दिरहम देने के बराबर है. इसलिए ईदे ग़दीर के दिन अपने मोमिन भाई के साथ एहसान व नेकी करो और अपने मोमिन भाई और मोमिना बहन को ख़ुश करो, ख़ुदा की क़सम! अगर लोगों को इस दिन की फ़ज़ीलत का इल्म होता और वो उसका ख़याल रखते तो उस दिन फ़रिश्ते उनसे दस बार मुसाफ़िहा करते, मुख़्तसर यह कि इस दिन की ताज़ीम करना ज़रूरी है और उसमें कुछ आमाल ये हैं: 

(1)इस दिन का रोज़ा रखना साठ साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है, एक रिवायत में है कि रोज़े ग़दीर का रोज़ा दुनिया की मुद्दत के रोज़ों, सौ हज और सौ उमरह के बराबर है.

(2)इस दिन ग़ुस्ल करना ख़ैर व बरकत का सबब है.

(3)इस दिन जहाँ कहीं भी हो ख़ुद को रौज़-ए-अमीरुल मोमेनीन अ. पर पहुंचाए और आपकी ज़ियारत करे. इस दिन के लिए हज़रत की तीन मख़सूस ज़ियारतें हैं और उनमें सबसे ज़्यादा मशहूर ज़ियारते अमीनुल्लाह है जो दूर व नज़दीक से पढ़ी जा सकती है. यह ज़ियारते जामे’अ-ए-मुतलक़ा है और इसे मफ़ातीह के ज़ियारत वाले हिस्से में ज़िक्र किया गया है.

(4)हज़रत रसूले ख़ुदा स. से मन्क़ूल तावीज़ पढ़े कि सैय्यद ने किताबे इक़बाल में उसका ज़िक्र किया है.

(5)दो रक्’अत नमाज़ बजा लाये और सजद-ए-शुक्र में सौ मर्तबा “शुकरन-शुकरन” कहे, फिर सजदे से सर उठाए और यह दुआ पढ़े.  

اَللّٰھُمَّ إنِّی ٲَسْٲَلُکَ بِٲَنَّ لَکَ الْحَمْدَ وَحْدَکَ لاَ شَرِیکَ لَکَ وَٲَ نَّکَ واحِدٌ ٲَحَدٌ صَمَدٌ

ऐ माबूद! सवाल करता हूँ तुझसे इसलिए कि सारी तारीफ़ें सिर्फ़ तेरे ही लिए हैं, तेरा कोई शरीक नहीं और ये कि तू एक व यकता है.

لَمْ تَلِدْ وَلَمْ تُولَدْ وَلَمْ یَکُنْ لَکَ کُفُواً ٲَحَدٌ، وَٲَنَّ مُحَمَّداً عَبْدُکَ وَرَسُولُکَ صَلَواتُکَ

न ही तूने किसी को जना है और न ही तुझे किसी ने जना है और तेरा कोई हमसर नहीं और यह कि हज़रत मुहम्मद स. तेरे बन्दे और तेरे रसूल हैं, तेरा दुरूद हो

عَلَیْہِ وَآلِہِ، یَا مَنْ ھُوَ کُلَّ یَوْمٍ فِی شَٲْنٍ کَما کانَ مِنْ شَٲْنِکَ ٲَنْ تَفَضَّلْتَ عَلَیَّ بِٲَنْ

उन पर और उनकी आल अ. पर, ऐ वह ज़ात! जो हर दिन एक नयी शान में है, जो तेरी शान के लाएक़ है कि तूने मुझ पर फ़ज़्ल किया कि मुझे 

جَعَلْتَنِی مِنْ ٲَھْلِ إجابَتِکَ وَٲَھْلِ دِینِکَ وَٲَھْلِ دَعْوَتِکَ، وَوَفَّقْتَنِی لِذلِکَ فِی مُبْتَدَئ

उनमें से रखा जिसकी दुआ तूने पूरी की जो तेरे दीन पर हैं और तेरे पैग़ाम को पहुँचाने वाले हैं और मुझे इस बात की तौफ़ीक़ मेरी पैदाइश से 

خَلْقِی تَفَضُّلاً مِنْکَ وَکَرَماً وَجُوداً ثُمَّ ٲَرْدَفْتَ الْفَضْلَ فَضْلاً وَالْجُودَ جُوداً وَالْکَرَمَ

ही अता फ़रमाई,अपनी मेहरबानी और बख़्शिश से, फिर लगातार फ़ज़्ल, बख़्शिश और करम किया 

کَرَمَاً رَٲْفَۃً مِنْکَ وَرَحْمَۃً إلی ٲَنْ جَدَّدْتَ ذلِکَ الْعَھْدَ لِی تَجْدِیداً بَعْدَ تَجْدِیدِکَ خَلْقِی


यहाँ तक कि मेरी बंदगी के वादे को मेरी नयी पैदाइश के बाद फिर से नया किया

وَکُنْتُ نَسْیاً مَنْسِیّاً ناسِیاً ساھِیاً غافِلاً، فَٲَ تْمَمْتَ نِعْمَتَکَ بِٲَنْ ذَکَّرْتَنِی ذلِکَ وَمَنَنْتَ

जब मैं भूला बिसरा भूलने वाला और बे ध्यान व बेख़बर था तो तूने अपनी नेमत तमाम करते हुए मुझे वह वादा याद दिलाया और यूँ मुझ पर एहसान किया 

بِہِ عَلَیَّ وَھَدَیْتَنِی لَہُ، فَلْیَکُنْ مِنْ شَٲْنِکَ یَا إلھِی وَسَیِّدِی وَمَوْلایَ ٲَنْ

और उसकी तरफ़ मेरी रहनुमाई की, तो ऐ मेरे माबूद, मेरे मौला और ऐ मेरे सरदार! यह तेरी ही शाने करीमी है कि उस 

تُتِمَّ لِی ذلِکَ وَلاَ تَسْلُبْنِیہِ حَتَّی تَتَوَفَّانِی عَلَی ذلِکَ وَٲَ نْتَ عَنِّی راضٍ، فَ إنَّکَ ٲَحَقُّ

वादे को पूरा करवा दे और उसे मुझसे अलग न कर यहाँ तक कि उसी पर मुझे मौत दे दे इस हाल में कि तू मुझसे राज़ी हो क्योंकि तू नेमत देने  

الْمُنْعِمِینَ ٲَنْ تُتِمَّ نِعْمَتَکَ عَلَیَّ ۔ اَللّٰھُمَّ سَمِعْنا وَٲَطَعْنا وَٲَجَبْنا داعِیَکَ

वालों में ज़्यादा हक़दार है कि मुझ पर अपनी नेमत तमाम कर दे. ऐ माबूद! हमने सुना, हमने बात मानी और तेरी तरफ़ से बुलाने वाले की आवाज़ पर लब्बैक कही 

بِمَنِّکَ، فَلَکَ الْحَمْدُ غُفْرانَکَ رَبَّنا وَ إلَیْکَ الْمَصِیرُ، آمَنّا بِاللّهِ وَحْدَہُ لاَ
  
तेरे एहसान की बदौलत, तो सारी तारीफ़ें बस तेरे ही लिए हैं, तुझसे चाहते हैं कि हमें माफ़ कर दे ऐ हमारे परवरदिगार! और हम तेरी ही तरफ़ पलट कर आने वाले हैं, हम एक अल्लाह पर ईमान लाये जिसका कोई 

شَرِیکَ لَہُ، وَبِرَسُو لِہِ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللّهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ، وَصَدَّقْنا وَٲَجَبْنا داعِیَ اللّهِ

शरीक नहीं, और उसके रसूल मुहम्मद स. पर ईमान लाये और हमने अल्लाह की तरफ़ से बुलाने वाले की दावत को क़ुबूल किया और उसकी तस्दीक़ की 

وَاتَّبَعْنا الرَّسُولَ فِی مُوالاۃِ مَوْلانا وَمَوْلَی الْمُؤْمِنِینَ ٲَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ عَلِیِّ بْنِ ٲَبِی

और रसूल स. की पैरवी की, अपने मौला और मोमेनीन के मौला अमीरुल मोमेनीन अली इब्ने तालिब अ. की विलायत को क़ुबूल करने में 

طالِبٍ عَبْدِ اللّهِ، وَٲَخِی رَسُو لِہِ، وَالصِّدِّیقِ الْاَکْبَرِ، وَالْحُجَّۃِ عَلَی بَرِیَّتِہِ، الْمُؤَیِّدِ

जोकि अल्लाह के बन्दे, उसके रसूल स. के भाई, सिद्दीक़े अकबर, उसकी मख़लूक़ पर हुज्जत, उनके ज़रिये 

بِہِ نَبِیَّہُ وَدِینَہُ الْحَقَّ الْمُبِینَ، عَلَماً لِدِینِ اللّهِ، وَخازِناً لِعِلْمِہِ، وَعَیْبَۃَ غَیْبِ اللّهِ

अल्लाह ने अपने नबी की ताईद की और सच्चे व वाज़ेह दीन को मज़बूती अता की, वह उसके इल्म के ख़ज़ानेदार और अल्लाह के ग़ैब का ज़र्फ़ 

وَمَوْضِعَ سِرِّ اللّهِ، وَٲَمِینَ اللّهِ عَلَی خَلْقِہِ، وَشاھِدَہُ فِی بَرِیَّتِہِ ۔ اَللّٰھُمَّ رَبَّنا إنَّنا

और उसके राज़दार हैं और उसकी मख़लूक़ पर उसके अमानतदार और गवाह हैं. ऐ माबूद! हमारे परवरदिगार बेशक हमने 

سَمِعْنا مُنادِیاً یُنادِی لِلاِیْمانِ ٲَنْ آمِنُوا بِرَبِّکُمْ فَآمَنَّا رَبَّنا فَاغْفِرْ لَنا ذُنُوبَنا وَکَفِّرْ

एक आवाज़ लगाने वाले को ईमान के लिए आवाज़ लगाते हुए सुना कि अपने परवरदिगार पर ईमान ले आओ तो हम ईमान ले आये, ऐ हमारे रब! तो हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे और 

عَنَّا سَیِّئاتِنا وَتَوَفَّنا مَعَ الْاَبْرارِ، رَبَّنا وَآتِنا مَا وَعَدْتَنا عَلَی رُسُلِکَ وَلاَ تُخْزِنا یَوْمَ

हमारी बुराइयों को मिटा दे और हमें नेक लोगों जैसी मौत दे. ऐ हमारे रब! हमें वह अता कर दे जिसका वादा तूने अपने रसूलों के ज़रिये हमसे किया है और हमें 

الْقِیامَۃِ إنَّکَ لاَ تُخْلِفُ الْمِیعادَ، فَ إنَّا یَا رَبَّنا بِمَنِّکَ وَلُطْفِکَ ٲَجَبْنا

क़यामत के दिन रुसवा न कर कि बेशक तू वादे की ख़िलाफ़वर्ज़ी नहीं करता, तो ऐ हमारे रब! हमने तेरे 

داعِیَکَ، وَاتَّبَعْنَا الرَّسُولَ وَصَدَّقْناہُ، وَصَدَّقْنا مَوْلَی الْمُؤْمِنِینَ، وَکَفَرْنا بِالْجِبْتِ

लुत्फ़ व एहसान से तेरे दावत देने वाले को लब्बैक कही और हमने रसूल स. की पैरवी और उनकी तसदीक़ की और मोमिनों के मौला की तसदीक़ की और हमने बुत 

وَالطَّاغُوتِ، فَوَ لِّنا مَا تَوَلَّیْنا، وَاحْشُرْنا مَعَ ٲَئِمَّتِنا فَ إنَّا بِھِمْ مُؤْمِنُونَ

और शैतान की पैरवी से इंकार किया तो हमारा सरपरस्त उसे बना जिसकी सरपरस्ती हमने क़ुबूल की है और हमें रोज़े क़यामत हमारे इमामों के साथ उठा कि हम उन पर ईमान, 

مُوقِنُونَ، وَلَھُمْ مُسَلِّمُونَ، آمَنَّا بِسِرِّھِمْ وَعَلانِیَتِھِمْ وَشاھِدِھِمْ وَغائِبِھِمْ، وَحَیِّھِمْ

यक़ीन रखने वाले और उनके सामने तसलीम हैं, हम उनके ज़ाहिर व बातिन और ग़ाएब व हाज़िर पर ईमान लाये और ज़िन्दा 

وَمَیِّتِھِمْ، وَرَضِینا بِھِمْ ٲَئِمَّۃً وَقادَۃً وَسادَۃً، وَحَسْبُنا بِھِمْ بَیْنَنا وَبَیْنَ اﷲ دُونَ

व दुनिया से वफ़ात पा जाने वालों पर ईमान लाये, हम इस पर राज़ी हैं कि वो हमारे इमाम, पेशवा और सरदार हैं, और वो हमारे और ख़ुदा के बीच काफ़ी हैं 

خَلْقِہِ لاَ نَبْتَغِی بِھِمْ بَدَلاً وَلاَ نَتَّخِذُ مِنْ دُونِھِمْ وَلِیجَۃً، وَبَرِئْنا إلَی اللّهِ مِنْ کُلِّ مَنْ

बिना किसी दूसरी मखलूक के वास्ते के, हम उनकी जगह किसी और को नहीं चाहते और न ही उनके सिवा किसी को वास्ता बनाते हैं और ख़ुदा के हुज़ूर हम उन लोगों से अपनी 

نَصَبَ لَھُمْ حَرْباً مِنَ الْجِنِّ وَالْاِنْسِ مِنَ الْاَولِینَ وَالْاَخِرِینَ، وَکَفَرْنا بِالْجِبْتِ

बेज़ारी का इज़हार करते हैं; जिन्नातों में से और इंसानों में से जिन्होंने इमामों के मुक़ाबिले में आकर जंग की, पहले वालों में से या आखरी वालों में से जो भी हों, और हमने इंकार किया 

وَالطَّاغُوتِ وَالْاَوْثانِ الْاَرْبَعَۃِ وَٲَشْیاعِھِمْ وَٲَ تْباعِھِمْ وَکُلِّ مَنْ والاھُمْ مِنَ الْجِنِّ

बुत और शैतान का और चारों बुतों और उनके मददगारों और पैरोकारों का और हर उस फ़र्द का जिसने 

وَالاِنْسِ مِنْ ٲَوَّلِ الدَّھْرِ إلی آخِرِہِ ۔ اَللّٰھُمَّ إ نَّا نُشْھِدُکَ ٲَنَّا نَدِینُ بِما

ऐसों से मोहब्बत की; हम दूर हैं जिन्नातों में से हों या इंसानों में से, ज़माने की शुरुआत से लेकर आख़िर तक. ऐ अल्लाह! हम तुझे गवाह बनाते हैं कि हमने 

دانَ بِہِ مُحَمَّدٌ وَآلُ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللّهُ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ، وَقَوْلُنا مَا قالُوا، وَدِینُنا مَا

उसी दीन की पैरवी की जिस पर मुहम्मद स. व आले मुहम्मद स. थे, हमारी बात वही है जो उनकी थी और हमारा दीन 

دانُوا بِہِ، مَا قالُوا بِہِ قُلْنا، وَمَا دانُوا بِہِ دِنَّا، وَمَا ٲَ نْکَرُوا ٲَ نْکَرْنا، وَمَنْ والَوْا

वही है जो उनका था, जो उन्होंने फ़रमाया वही हमने कहा, जिस दीन पर वो चले उसी पर हम चले, जिस चीज़ का उन्होंने इंकार किया उसी का हमने भी इंकार किया और जिससे उन्होंने 

والَیْنا، وَمَنْ عادَوْا عادَیْنا، وَمَنْ لَعَنُوا لَعَنَّا، وَمَنْ تَبَرَّٲُوا مِنْہُ تَبَرَّٲْنا مِنْہُ،

मोहब्बत की, उसी से हमने भी मोहब्बत की, जिससे उन्होंने दुश्मनी की उसी से हमने भी दुश्मनी की, जिस पर उन्होंने लानत की उसी पर हमने भी लानत की, जिससे उन्होंने बेज़ारी रखी उसी से हम भी बेज़ार रहे

وَمَنْ تَرَحَّمُوا عَلَیْہِ تَرَحَّمْنا عَلَیْہِ، آمَنَّا وَسَلَّمْنا وَرَضِینا وَاتَّبَعْنا مَوالِیَنا صَلَواتُ

जिस पर उन्होंने मेहरबानी की उस पर हम भी मेहरबान रहे, हम ईमान लाये, तस्लीम किया, राज़ी रहे और अपने आक़ाओं की पैरवी की 

اللّهِ عَلَیْھِمْ ۔ اَللّٰھُمَّ فَتَمِّمْ لَنا ذلِکَ وَلاَ تَسْلُبْناہُ وَاجْعَلْہُ مُسْتَقِرّاً ثابِتاً عِنْدَنا، وَلاَ

उन पर अल्लाह की रहमत नाजिल हो, ऐ अल्लाह! हमारा यह अक़ीदा कामिल कर दे और इसे हमसे न छीन और इसे हमारे पास हमेशा के लिए बाक़ी रहने दे 

تَجْعَلْہُ مُسْتَعاراً، وَٲَحْیِنا مَا ٲَحْیَیْتَنا عَلَیْہِ، وَٲَمِتْنا إذا ٲَمَتَّنا عَلَیْہِ، آلُ مُحَمَّدٍ ٲَئِمَّتُنا

और इसे वक़्ती तौर पर न रहने दे, जब तक हम ज़िन्दा हैं हमें इस पर ज़िन्दा रख और हमें इसी अक़ीदे पर मौत दे कि आले मुहम्मद स. हमारे इमाम हैं 

فَبِھِمْ نَٲْ تَمُّ وَ إیَّاھُمْ نُوالِی، وَعَدُوَّھُمْ عَدُوَّ اللّهِ نُعادِی، فَاجْعَلْنا مَعَھُمْ فِی الدُّنْیا

तो हम उन्हीं को अपना इमाम व पेशवा मानें और उन्हीं से मुहब्बत करें, और उनका दुश्मन ख़ुदा का दुश्मन है, हम उससे दुश्मनी रखें इसलिए हमें उनके साथ दुनिया 

وَالْاَخِرَۃِ وَمِنَ الْمُقَرَّبِینَ، فَ إنَّا بِذلِکَ راضُونَ یَا ٲَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ ۔

व आख़ेरत में क़रार दे और अपने नज़दीक बन्दों में से बना कि हम इस अक़ीदे पर राज़ी हैं. ऐ सबसे ज़्यादा रहेम करने वाले!

इस दुआ को पढ़ने के बाद सजदे में जाए और 100 मर्तबा कहे: “अलहम्दु लिल्लाह”, और 100 बार कहे: “शुकरन लिल्लाह” 

रिवायत में है कि जो इन्सान इस अमल को अंजाम दे वो अज्र व सवाब में उस इन्सान के बराबर है जो ईदे ग़दीर के दिन हज़रत रसूले ख़ुदा स. की ख़िदमत में हाज़िर हुआ हो और जनाबे अमीर अ. के दस्ते मुबारक पर विलायत की बैअत की हो. 

बेहतर है कि इस नमाज़ को ज़वाल (अज़ाने ज़ोहर का अव्वल वक़्त) के नज़दीक पढ़े क्योंकि यही वह वक़्त है जब रसूले ख़ुदा स. ने अमीरुल मोमेनीन अ. को ग़दीर के मक़ाम पर इमामत व ख़िलाफ़त के लिए मंसूब फ़रमाया. इस नमाज़ की पहली रक्’अत में सूरए हम्द के बाद सूरए इन्ना अनज़लना, और दूसरी रक्’अत में सूरए हम्द के बाद सूरए तौहीद की तिलावत करे. 

       (6). ग़ुस्ल करे ज़वाल से आधा घंटा पहले, दो रक्’अत नमाज़ पढ़े जिसकी हर रक्’अत में सूरए हम्द के बाद 10 बार सूरए तौहीद, 10 बार आयतल कुर्सी, और 10 बार इन्ना अनज़लना पढ़े तो उसे 1 लाख हज, 1 लाख उमरह का सवाब मिलेगा साथ ही उसकी दुनिया व आख़ेरत की हाजतें आसानी से पूरी होंगी.

 इस नमाज़ के बाद रब्बना इन्नना समे’अना मुनादियन... वाली दुआ पढ़े. यह एक लम्बी दुआ है.


       (7) इस दिन दुआए नुदबा पढ़े.

       (8) जब मोमिन किसी दूसरे मोमिन भाई से मुलाक़ात करे तो ईदे ग़दीर की मुबारकबाद इस तरह दे:

الْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی جَعَلَنا مِنَ الْمُتَمَسِّکینَ بِوِلایَۃِ ٲَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ وَالْاَ ئِمَّۃ عَلَیْھِمُ اَلسَّلَامُ

सारी तारीफ़ें उस अल्लाह के लिए हैं जिसने हमें अमीरुल मोमेनीन अ. की और अइम्मा अ. की  विलायत के मानने वालों में रखा 

और यह भी पढ़े: الْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی ٲَکْرَمَنا بِھذَا الْیَوْمِ وَجَعَلَنا مِنَ الْمُوفِینَ

सारी तारीफ़ें उस अल्लाह के लिए हैं जिसने हमें इस दिन के ज़रिये इज़्ज़त अता की और हमें उस वादे को पूरा करने वाला बनाया 

بِعَھْدِہِ إلَیْنا وَمِیثاقِہِ الَّذِی واثَقَنا بِہِ مِنْ وِلایَۃِ وُلاۃِ ٲَمْرِہِ وَالْقُوَّامِ بِقِسْطِہِ، وَلَمْ

जो हमसे कराया गया था और वो वादा जो हमसे उसके वलियों की विलायत और इंसाफ़ काएम करने वालों के बारे में लिया गया था और हमें 

یَجْعَلْنا مِنَ الْجاحِدِینَ وَالْمُکَذِّبِینَ بِیَوْمِ الدِّینِ۔

क़यामत के दिन का इंकार करने वालों और झुटलाने वालों में से नहीं रखा.

          (9) 100 बार कहे: الْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی جَعَلَ کَمالَ دِینِہِ وَتَمامَ نِعْمَتِہِ بِوِلایَۃِ ٲَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ عَلِیِّ بْنِ ٲَبِی طالِبٍ عَلَیْہِ اَلسَّلَامُ

सारी तारीफ़ें उस अल्लाह के लिए हैं जिसने विलायते अमीरुल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब अ. के ज़रिये अपने दीन को कामिल और अपनी नेमतों को तमाम किया.    
 
 वाज़ेह रहे कि ईदे ग़दीर के दिन अच्छे कपड़े पहने, ख़ुशबू लगाये, ख़ुश व ख़ुर्रम रहे, मोमेनीन को राज़ी व ख़ुश रखे, उनकी ग़लतियाँ माफ़ करे, उनकी ज़रूरतें पूरी करे, रिश्तेदारों से अच्छा बर्ताव करे. घर वालों के लिए अच्छे खाने का इंतेज़ाम करे, मोमेनीन की मेहमान नवाज़ी करे और उनका रोज़ा इफ़्तार कराये. उनसे मुसाफ़िहा करे,
 मोमिन भाइयों से ख़ुशी ख़ुशी मुलाक़ात करे और उनको गिफ़्ट्स दे, इस अज़ीम नेमत यानी विलायते अमीरुल मोमेनीन अ. पर ख़ुदा का शुक्र अदा करे, ज़्यादा से ज़्यादा सलवात पढ़े और ख़ुदा की इबादत करे कि इनमें से हर एक काम की बड़ी फ़ज़ीलत है.

इस दिन अपने मोमिन भाई को एक रूपया देना दूसरे दिनों में एक लाख रूपये देने के बराबर सवाब रखता है और इस दिन मोमिन भाइयों को खाने पर दावत देना ऐसा है कि जैसे सारे पैग़म्बरों और मोमिनों को दावत दी हो. 

अमीरुल मोमेनीन अ. के ख़ुतब-ए-ग़दीर में है कि जो इंसान आज के दिन किसी रोज़ेदार को इफ़्तारी देगा वह ऐसा है कि जैसे उसने दस “फ़ेआम” को इफ़्तारी दी है, एक शख्स ने उठ कर अर्ज़ किया: मौला! “फ़ेआम” क्या है? फ़रमाया कि इसका मतलब एक लाख पैग़म्बर, सिद्दीक़ और शहीद हैं. अब कितना सवाब होगा उस इन्सान का जो कई मोमिनों का ख़र्च उठा रहा हो! तो मैं अल्लाह की बारगाह में ज़ामिन हूँ ऐसे शख्स का कि वो कुफ़्र और फ़क़ीरी से महफ़ूज़ रहेगा.

ख़ुलासा यह कि इस दिन की फ़ज़ीलत का बयान हमारी ताक़त से बाहर है, यह शियों के आमाल के क़ुबूल होने और उनके ग़मों के दूर होने का दिन है.

इसी दिन हज़रत मूसा अ. को जादूगरों पर फ़त्ह हासिल हुई थी और हज़रत इब्राहीम अ. के लिए आग गुलज़ार हुई थी, और हज़रत मूसा अ. ने यूशा बिन नून (अ.) को वसी बनाया था और हज़रत ईसा अ. की तरफ़ से हज़रत शमऊन अ. को विलायत व विसायत मिली थी, हज़रत सुलैमान अ. ने आसिफ़ बिन बर्ख़िया की वेज़ारत व जानशीनी पर लोगों को गवाह बनाया था और इसी दिन हज़रत रसूले ख़ुदा स. ने अपने असहाब के बीच “बरादरी” का रिश्ता क़ाएम किया था, लिहाज़ा इस दिन मोमिनों को चाहिए कि “सीग़-ए-उख़ुव्वत” पढ़ें और आपस में भाईचारा क़ाएम करें.

शैख़ अब्बास क़ुम्मी ने इसका तरीक़ा "मफ़ातीहुल जिनान" में बयान किया है. अधिक जानकारी के लिए दुआओं की इस किताब के "ज़िलहिज्ज के आमाल" के हिस्से में "ईदे ग़दीर के आमाल" वाला हिस्सा देखें. 

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