दह्वुल अर्ज़ (25 ज़ीक़ादा) की फ़ज़ीलत और अमाल पर रौशनी डालें?

दह्वुल अर्ज़ (25 ज़ीक़ादा) की फ़ज़ीलत और अमाल पर रौशनी डालें?

जवाब 

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

दह्वुल अर्ज़ का मतलब ज़मीन को फैलाने के हैं क्योंकि डिक्शनरी में “दह्व” का मतलब फैलाना है, पहले ज़मीन की सतह तूफ़ानी बारिशों से भरी हुई थी उसके बाद यह पानी धीरे धीरे ज़मीन के सूराख़ों में चला गया और ज़मीन की ख़ुश्की सामने आ गयी यहाँ तक कि ज़मीन मौजूदा हालत में बदल गयी.

सूरए नाज़ेआत की 30वीं आयत में وَالْأَرْضَ بَعْدَ ذَلِکَ دَحَاهَا उसके बाद ज़मीन का फ़र्श बिछाया यह उसी ज़मीन के फैलाने की तरफ़ इशारा है. कुछ रिवायतों में आया है कि ज़मीन को सबसे पहले काबे के नीचे से फैलाना शुरू किया गया.जैसा कि रसूले ख़ुदा स. ने एक हदीस में फ़रमाया: دُحِیَتِ الْأَرْضُ مِنْ مَکَّةَ وَ کَانَتِ الْمَلَائِکَةُ تَطُوفُ بِالْبَیْتِ وَ هِیَ أَوَّلُ مَنْ طَافَ بِهِ وَ هِیَ الْأَرْضُ الَّتِی قَالَ اللَّهُ إِنِّی جاعِلٌ فِی الْأَرْضِ خَلِیفَةً

ज़मीन मक्के से बिछना शुरू हुई, फ़रिश्ते ख़ान-ए-काबा के गिर्द तवाफ़ कर रहे थे, वह सबसे पहली जगह है जहाँ पर तवाफ़ किया गया.

हज़रत अली अ. से किसी ने सवाल किया कि मक्के को मक्का क्यों कहते हैं? आप अ. ने फ़रमाया: لأن الله مک الأرض من تحتها، أی دحاها

इसलिए कि ज़मीन, मक्के के नीचे से फैलना शुरू हुई.

इमामे रज़ा अ. ने जब ख़ुरासान का सफ़र किया तो उस सफ़र के दौरान 25 ज़ीक़ादा को आप मर्व में पहुंचे और आपने फ़रमाया: आज के दिन रोज़ा रखो, मैंने भी रोज़ा रखा है, रावी कहता है कि हमने पूछा ऐ फ़रज़न्दे रसूल स.! आज कौन सा दिन है? तो फ़रमाया: वह दिन है जिस में अल्लाह की रहमत नाज़िल हुई और ज़मीन का फ़र्श बिछाया गया.

 इस दिन के आमाल:

यह दिन बहुत बा बरकत है और इसके कुछ ख़ास आमाल हैं:

  1. रोज़ा रखना (इस दिन का रोज़ा सत्तर साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है)
  2. शबे दह्वुल अर्ज़ में रात भर जागकर इबादत करना.
  3. इस दिन की मख़सूस दुआएँ पढ़ना.
  4. इस दिन गुस्ल करना और ज़ोहर के नज़दीक इस तरीक़े से नमाज़ पढ़ना

हर रक्’अत में सूरए हम्द के बाद 5 बार सूरए शम्स पढ़े और सलाम के बाद कहे: “ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम” और इस दुआ को पढ़े: یا مُقیلَ الْعَثَراتِ اَقِلْنی عَثْرَتی یا مُجیبَ الدَّعَواتِ اَجِبْ دَعْوَتی یا سامِعَ الْاَصْواتِ اِسْمَعْ صَوْتی وَ ارْحَمْنی و تَجاوَزْ عَنْ سَیئاتی وَ ما عِنْدی یا ذَالْجَلالِ وَ الْاِکْرام

  1. मफ़ातीहुल जिनान में मौजूद इस दिन की दुआ पढ़ना जो इन अलफ़ाज़ से शुरू होती है: اللّهمّ یا داحِی الْکعبهَ وَ فالِقَ الْحَبَّه

हवाले:

  1. नासिर मकारिम शीराज़ी, तफ़सीरे नमूना, जि. 26, पे. 100 
  2. बिहारुल अनवार, जि. 54, पे. 64 व 206
  3. अल-इक़बालु बिल-आमालिल-हसना,जि.2,पे.23-24 व 27
  4. मफ़ातीहुल जिनान, ज़ीक़ादा महीने के आमाल 
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