क्या तक़लीद ज़रूरी है और क्यों?

क्या ज़रूरी है कि तक़लीद की जाए? जबकि इस्लाम  व कुरान में बाप दादा और पुरखों की पैरवी की आलोचना की गयी है? 

जवाब

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

तक़लीद ज़रूरी नहीं है, बल्कि उसूले दीन में तो तक़लीद हराम है, हाँ फ़ुरूए दीन में तक़लीद जाएज़ है और यहाँ पर उसी तक़लीद की बात हो रही है यानी वही तक़लीद जिसके मुताबिक़ आम लोग फ़ुरूए दीन में मराजे-केराम की तरफ़ रुजू करते हैं वरना उसूले दीन में तो तक़लीद की बात ही नहीं हो सकती क्योंकि वहां तक़लीद हराम है. तक़लीदी दीन किसी से क़ुबूल नहीं किया जायेगा क्योंकि तक़लीदी दीन, दीन नहीं है, दीन की नक़्क़ाली है.

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अब यह अल्लाह का करम है कि उसने फ़ुरूए दीन में ख़ास शर्तों के साथ तक़लीद की इजाज़त दी है वरना अगर ख़ुदा फ़ुरूए दीन में भी तक़लीद को हराम कर देता तो सबको इज्तेहाद के दर्जे पर पहुँचना पड़ता, अगर मुतलक़ मुजतहिद न सही तो कुछ चैप्टर्स में तो मुजतहिद बनना ही पड़ता जिसे “मुज्तहिदे मुतजज़्ज़ी” कहा जाता है, वरना इन्सान सर पटकता रह जाता और उसके सारे आमाल अकारत होकर रह जाते. इसलिए सबसे पहले यह समझने की ज़रुरत है कि तक़लीद अल्लाह के लुत्फ़ व करम से एक सहूलत और नेमत का नाम है.

फ़ुरूए दीन में तक़लीद जाएज़ है, ज़रूरी नहीं कि आप तक़लीद ही करें, अगर आप किसी की तक़लीद नहीं करना चाहते तो दो और रास्ते हैं, या आप ख़ुद इज्तेहाद के दर्जे पर पहुँच जाएँ कि ऐसी सूरत में ख़ुद बख़ुद तक़लीद हराम हो जाएगी और अगर इज्तेहाद नहीं कर सकते तो एहतियात पर अमल कर लीजिये यानी इस तरह अमल कीजिये कि सारे अनुमानों को इकठ्ठा कर लीजिये और उसके बाद इस तरह अमल कीजिये कि आप को यह यक़ीन हो जाये कि अपनी शरई ज़िम्मेदारी से फ़ारिग़ हो गए.

यक़ीनन इज्तेहाद और एहतियात यह दोनों रास्ते एक आम इन्सान के लिए आसान नहीं हैं, इसीलिए ख़ुदा ने आसान शरीयत में इस जगह पर आम लोगों के लिए ख़ास हालात में तक़लीद को जाएज़ कर दिया है.

तक़लीद का जवाज़ 

तक़लीद के जवाज़ और उसके शराएत के लिए शरीयत में बहुत सी दलीलें हैं, जिनमें से इमाम हसन अस्करी अ. की यह मशहूर व मारूफ़ हदीस जिसके एक जुमले में ग़ौर करने से पता चलता है कि किसकी तक़लीद की जा सकती है, कौन तक़लीद कर सकता है, हदीस के अलफ़ाज़ ये हैं: فاما من کان من الفقها حافظا لدینه مخالفا لهواه مطیعا لامر مولاه فللعوام ان یقلدوه۔

किसकी तक़लीद की जाए? पहली शर्त यह है वह फ़क़ीह हो, केवल मामूली आलिम नहीं बल्कि फ़क़ीह हो यानी साहेबे नज़र और मुजतहिद हो, केवल दीन का इल्म न हासिल किया हो बल्कि दीन को इस्तेम्बात (दीन के सोर्सेज़ के ज़रिये फ़तवा हासिल करना) के ज़रिये हासिल किया हो, उसके बाद “मिनल फ़ोक़हा” की लफ़्ज़ से यह समझ में आता है कि हर फ़क़ीह की भी तक़लीद नहीं की जा सकती बल्कि उसके अन्दर और भी शर्तें पाई जानी चाहिए जैसे कि अपने दीन की हिफ़ाज़त करने वाला, अपनी ख़्वाहिशात की मुख़ालिफ़त करने वाला, अपने मौला के हुक्म की इताअत करने वाला...इन सारी शर्तों से पता चलता है कि इल्मी सलाहियत से ज़्यादा अख़लाक़ व किरदार से सम्बंधित शर्तें हैं, सिर्फ़ इल्मी सलाहियत और इल्मी बरतरी काफ़ी नहीं है. “فللعوام ان یقلدوه ” में “लाम” से पता चलता है कि अवाम के लिए तक़लीद ज़रूरी है.

अक़्ल का भी यही तक़ाज़ा है कि जब आप मरीज़ होते हैं तो अक़्ल क्या कहती है कि आप किसके पास रुजू करें, इंजीनियर के पास,बनिया के पास या डॉक्टर के पास? ज़ाहिर है कि अक़्ल डॉक्टर के पास जाने का हुक्म देती है. जब इन्सान ख़ुद शरीयत से वाक़िफ़ न हो और जहन्नुम में जाने से बचने के लिए शरीयत पर अमल करना चाहता हो तो मसाएल पूछने के लिए किसकी तरफ़ रुजू करे? आलम मुजतहिद की तरफ़ या किसी जाहिल की तरफ़? अक़्ले सलीम यही कहती है कि उसकी तरफ़ रुजू किया जाये जो दीन के अहकाम से वाक़िफ़ हो बल्कि उसमे स्पेशलिस्ट हो, जिसे मुजतहिद कहते हैं और उसी के फ़तवे पर अमल करने को तक़लीद कहते हैं.

वाज़ेह रहे कि यह तक़लीद अंधी तक़लीद नहीं है बल्कि हम किसी की तक़लीद तभी करते हैं जब उसके अन्दर तक़लीद के लिए ज़रूरी सलाहियतें मौजूद हों, हाँ अगर कोई उन शर्तों को परखे बिना तक़लीद करने लगे तो वह अंधी तक़लीद होगी और ऐसी तक़लीद इस्लाम में क़ाबिले क़ुबूल नहीं है और क़ुरान में भी इसी तरह की तक़लीद की आलोचना की गयी है ख़ास कर उसूले दीन में तक़लीद से रोका गया है.            


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