इंसानी अक़्ल को पीछे ले जाने वाली दीनी हिदायतों की क्या ज़रुरत है?

ख़ुदा ने अम्बिया और अइम्मा को क्यों भेजा है जबकि आज का इन्सान ख़ुद तरक़्क़ी करके अपने लिए फ़ायदेमंद चीज़ें और क़ानून बना रहा है हालाँकि दीनी बातें इन्सान को पीछे ले जाती हैं, तो सवाल यह है कि तरक़्क़ी के रास्ते पर चलने वाली इंसानी अक़्ल को पीछे ले जाने वाली दीनी हिदायतों की क्या ज़रुरत है?

जवाब 

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

बेशक इन्सान के पास अक़्ल है जिसके ज़रिये उसे हिदायत मिलती है, तरक़्क़ी करता है, अपनी ज़ाती और समाजी ज़िन्दगी को उसके ज़रिये संवारता है, क़ानून बनाता है, तहज़ीब व सभ्यता पैदा करता है...ये सब सही है लेकिन अक़्ल की इस समझ की भी एक हद है, वह उस हद के बाहर अपने बल पर नहीं जा सकती और ख़ुद अक़्ल भी अपनी इस हद को समझती है, अक़्ल सिर्फ़ उसी को समझ सकती है जहाँ तक उसकी पहुँच है यानी सिर्फ़ इस दुनिया के बारे में समझ सकती है लेकिन इस से ज़्यादा नहीं.

दीन इन्सान को वो बुनयादी शिक्षाएं देता है जो इन्सान की पहुँच से बाहर थीं और इन्सान की स’आदत के लिए ज़रूरी, लाज़मी और नींव की हैसियत रखती हैं और जहाँ तक ख़ुद अक़्ल की पहुँच का मस’अला है तो ज़रूरी नहीं कि दीन इस बारे में भी हिदायत दे, इसीलिए दीन साइंस की मालूमात देने के लिए नहीं आया है क्योंकि इन्सान ख़ुद उस तक पहुँच सकता है हालाँकि साइंसी मालूमात हासिल करने के लिए कुल्ली (General Principles) और बुनयादी उसूल भी दीन ही देता है और दीने इस्लाम एक जामे’अ (comprehensive) और कामिल दीन होने की हैसियत से विज्ञानों के मूल सिद्धांतों के अलावा बहुत सी छोटी छोटी बातें भी वाज़ेह करता है लेकिन दीन का बुनयादी काम उन शिक्षाओं का पहुँचाना है जिन तक इन्सान की पहुँच नहीं है और उसी के साथ साथ सारे विज्ञानों के मूल सिद्धांत प्रदान करना है, अब  उसकी रौशनी में छोटी छोटी बातों को समझना, ये ख़ुद इन्सान के ऊपर है 

दीन इन्सान को वह शिक्षा देता है जिसका हासिल करना उसके बस में नहीं है जैसे जीवन का प्रारंभ और अंत, इस दुनिया के अलावा दूसरे संसार, अधिकार, रूह के कमालात वग़ैरह ये वह बातें हैं जिन तक इन्सान की पहुँच नहीं है, हालाँकि ऐसा नहीं है कि दीन साइंस के बारे में कुछ नहीं बताता बल्कि हक़ीक़त यह है कि इसी माद्दी (भौतिक) दुनिया को सही से समझने के लिए मूल सिद्धांत दीन ही ने बताये हैं. क़ुरान में और उस से कहीं ज़्यादा हदीसों में साइंसी मालूमात अधिक संख्या में मौजूद हैं लेकिन इसके बावजूद क़ुरान एक साइंसी किताब नहीं है बल्कि क़ुरान किताबे हिदायत है 

रह गयी यह बात कि दीन इन्सान को पीछे ले जाता है तो यह बात सही भी है और ग़लत भी. सही इस तरह है कि अगर असली दीन को नहीं समझा गया और दीन के असली स्रोत से दीन को नहीं लिया गया तो वह दीन हिदायत देने के बजाये उल्टा और ज़्यादा गुमराहियों के अँधेरे में झोंक देगा, यह जो कार्ल मार्क्स कहता था कि "दीन समाज का घुन है" उसका यह जुमला उस दीन के बारे में बिलकुल सही है जो अक्ल, इल्म और हिकमत का कट्टर विरोधी है, ज़ाहिर सी बात है ऐसा दीन पिछड़ेपन का कारण बनता है, तरक़्क़ी के लिए ऐसे दीन को छोड़ना ज़रूरी है इसीलिए पश्चिमी समाज ने जब चर्च के ख़ुद के बनाये हुए पुराने दीन को छोड़ा तो तरक़्क़ी के चौड़े रास्ते पर चल पड़ा.

लेकिन इस्लामी दुनिया में इसका बिलकुल उल्टा हुआ, जब तक समाज किसी हद तक इस्लामी शिक्षाओं पर चलता रहा तो तरक़्क़ी करता रहा. दुनिया की सबसे बड़ी और रौशन तहज़ीब, इस्लामी तहज़ीब रही है जिसने पूरी दुनिया को इल्म व हुनर की रौशनी दी, आज मौजूदा पश्चिम में इल्मी तरक़्क़ी, इस्लामी तहज़ीब ही की एहसानमंद है, बहुत से पश्चिमी स्कालर्स ने इस हक़ीक़त का साफ़ तौर पर इक़रार भी किया है मिसाल के तौर पर विल ड्यूरेंट ने अपनी किताब “सभ्यता का इतिहास” में बहुत ही विस्तार से इस पर रौशनी डाली है. 

लेकिन बाद में इस्लामी दुनिया ने पश्चिम देशों की नक़ल करते हुए दीन को छोड़ दिया, वह दीन जो ज़िन्दगी का मुकम्मल क़ानून लेकर आया है जो स’आदत और आख़ेरत की गारंटी लेता है उस दीन की तालीमात को मुसलमानों ने अपनी दुनियावी ज़िन्दगी में मिटा डाला, नतीजे में रोज़ बरोज़ पिछड़ेपन का शिकार होते गए

आज भी अगर मुसलमान फिर से तरक़्क़ी करना चाहें तो पश्चिमी दुनिया की नक़ल छोड़ना होगा और दीने इस्लाम को पूरी तरह से अपनाना होगा अलबत्ता इस्लाम का मतलब असली इस्लाम है अमरीकी इस्लाम नहीं वरना अमरीकी इस्लाम न सिर्फ़ ये कि तरक़्क़ी नहीं देता बल्कि पिछड़ेपन, जेहालत और हिमाक़त की गहरी खाई में ढकेल देता है. ऐसा दीन न सिर्फ़ समाज का घुन या अफ़ीम है बल्कि अल्लाह का अज़ाब भी  है 



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